शहादत से सेवा तक – बेटी प्रीति ने रचा इतिहास
महेंद्र पाल सिंह रावत अध्यक्ष पूर्व सैनिक संघर्ष समिति
ऑपरेशन संकल्प के योद्धा को प्रणाम पूर्व सैनिक महेंद्र आपके संकल्प और त्याग को प्रणाम करता है🙏
“वर्दी उतर सकती है, पर जिम्मेदारी नहीं” – यह पंक्ति आज फिर जीवंत हो उठी है। बहिन मीनाक्षी कंडवाल (वीरांगना) संघर्ष की जीवंत कहानी

लांस नायक शहीद सुशील चंद्र कंडवाल, 7 गढ़वाल राइफल्स ने 1996 में ऑपरेशन मेघदूत में सियाचिन की बर्फीली चोटियों पर मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। तब उनकी छोटी बेटी प्रीति सिर्फ 5 महीने की थी। बड़ी बेटी दीप्ति 2 साल की। लेकिन शहीद का सपना नहीं मरा।

वीरांगना मीनाक्षी कंडवाल ने पति की चिता की राख से संकल्प की लौ जलाई। उन्होंने दोनों बेटियों को पिता का सपना सुनाकर बड़ा किया – “देश की सेवा करनी है।”
आज वो सपना पूरा हुआ है।
डॉ. प्रीति कंडवाल उत्तराखंड में चिकित्साधिकारी नियुक्त हुई हैं।
यह सिर्फ नौकरी नहीं है। यह जवाब है उन सवालों का👉
(क) वीरांगना का संकल्प — नारी संकल्पित हो जाय तो कुछ भी असम्भव नहीं।
(ख) नशे में डूबते पहाड़ के बेटों से – देखो, शहीद की बेटी डॉक्टर बन गई। तुम क्या बनोगे?
(ग) हार मानने वालों से – 5 महीने की बच्ची ने पिता को देखे बिना MD किया। तुम्हारा बहाना क्या है?
(घ) समाज से – शहादत के बाद परिवार बिखरते नहीं, इतिहास रचते हैं।
बहिन मीनाक्षी ने दोनों बेटियों को अफसर बनाया। यह है फौजी परिवार का जज़्बा। ये प्रस्तुतियों से टूटते नहीं फौलाद बनकर समाज को मजबूती प्रदान करते है– आप क्या करोगे??
आज हम गर्व से कहते हैं – ऑपरेशन मेघदूत में सुशील चंद्र कंडवाल शहीद हुए थे।
ऑपरेशन संकल्प में उनकी बेटी प्रीति ने पहाड़ को जिता दिया।
कोटद्वार के सभी पूर्व सैनिक, वीर माताएं और वीर नारियाँ बहिन मीनाक्षी कंडवाल के संघर्ष को नमन करती हैं। इसी को कहते हैं माँ।
भारतीय सेना जिंदाबाद
शहीद सुशील चंद्र
कंडवाल अमर रहें।
जय उत्तराखंड।
महेंद्र पाल सिंह रावत अध्यक्ष
पूर्व सैनिक संघर्ष समिति।

