उत्तराखंड में आवारा पशुधन – संकट और समाधान 🐄🏔️
- आज उत्तराखंड की एक गंभीर और दर्दनाक सच्चाई सामने रख रहे है जिस पर गंभीरता से विचार और शोध करने की आवश्यकता है। एक समय था जब पशुधन ही उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ था – दूध, गोबर से खाद, बैल से खेती। आज वही पशुधन खेतों से निकलकर सड़कों पर आवारा भटक रहा है और अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? ❓:—
(क) पलायन – पहाड़ों से युवाओं का शहरों की ओर पलायन सबसे बड़ा कारण है। खेती और पशुपालन के लिए मेहनत करने वाला कोई नहीं बचा। बुजुर्ग पशुओं को पाल नहीं पाते, तो उन्हें छोड़ देते हैं।
(ख) आधुनिक तकनीक पर निर्भरता – ट्रैक्टर, पंप, यांत्रिक हल ने बैलों की जरूरत खत्म कर दी। घंटों का काम मिनटों में हो जाता है, लेकिन बैल बेकार हो गए।
(ग) आर्थिक घाटा – चारे की कमी, पशुचिकित्सा का अभाव और दूध के दाम कम होने से पशुपालन घाटे का सौदा बन गया है।
(घ) सामाजिक बदलाव – अब पशुपालन को “गौरव” नहीं, “बोझ” माना जाता है। - इसका असर क्या है?
(क)। सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं – खासकर रात में पहाड़ी सड़कों पर।
(ख) फसल नुकसान – आवारा गायें और बकरियां खेतों को उजाड़ देती हैं, जिससे किसान और निराश होकर खेती छोड़ देता है।
(ग) जैविक विविधता का नुकसान – बद्री गाय जैसी स्थानीय नस्लें धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं। - नीति निर्माताओं को क्या करना चाहिए? ✊ कैसे पशुधन को फिर से अर्थव्यवस्था से जोड़ना होगा
(क) वैल्यू एडिशन– बद्री घी, पहाड़ी दूध, ऊन को GI टैग और ब्रांडिंग देकर सीधे बाजार से जोड़ें। जब आय होगी तो पशु संपत्ति बनेंगे, बोझ नहीं।
(ख) गोशाला 2.0– सिर्फ आश्रय नहीं, बल्कि गोबर से बायोगैस, जैविक खाद, पंचगव्य उत्पाद_ बनाने के यूनिट लगाए जाएं। इससे गौशाला आत्मनिर्भर बनेगी। - तकनीक का संतुलित उपयोग
(क) स्मार्ट शेल्टर – सोलर पावर्ड गोशालाएं जहाँ आवारा पशुओं को रखा जाए और उनकी ट्रैकिंग RFID टैग से हो।
(ख) मोबाइल वेटनरी यूनिट – पहाड़ के दूरस्थ गांवों तक पहुंचे, ताकि पशुपालक को समय पर इलाज मिले।
(ग) कृषि-पशुपालन इंटीग्रेशन– यंत्रों के साथ-साथ बैलों का उपयोग ऑर्गेनिक फार्मिंग में करें। इससे मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ेगी और बैलों का उपयोग भी बना रहेगा। - सामाजिक और नीतिगत बदलाव
(क) पशुपालन को सम्मान– स्कूलों में पहाड़ी पशुधन और उसकी उपयोगिता पर पाठ्यक्रम शामिल हो।
(ख) स्थानीय नीति – ग्राम पंचायत स्तर पर “आवारा पशु नियंत्रण कानून” बने, जिसमें पशु छोड़ने पर जुर्माना हो और गोशाला में रखने की व्यवस्था हो।
(ग) रिवर्स माइग्रेशन को प्रोत्साहन – पशुपालन आधारित स्टार्टअप और सब्सिडी देकर युवाओं को पहाड़ में रोकें। - एक विचार
आधुनिक तकनीक का विरोध नहीं, बल्कि सामंजस्य जरूरी है। तकनीक खेती को आसान बनाए, पर पशुधन को बेघर न करे।
पशुधन उत्तराखंड की संस्कृति, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी तीनों का हिस्सा है। अगर इसे बचाया नहीं गया तो पहाड़ सिर्फ खाली मकान और सूखी जमीन बनकर रह जाएगा।
नीति तब सफल होगी जब पशुपालक को लगे कि पशु पालना घाटा नहीं, गर्व और आमदनी का जरिया है।
आपके हिसाब से सबसे पहले किस स्तर – गांव, तहसील या राज्य – पर इस समस्या का समाधान शुरू होना चाहिए?
महेंद्र पाल सिंह रावत अध्यक्ष
पूर्व सैनिक संघर्ष समिति।

