*ना जाने किस रूप में नारायण मिल जायें, दरिद्र नारायण ईश्वर रूप* *धर्म का मार्ग: आलेख और संकलन ऋषि कण्डवाल लेखक उत्तराखण्ड सरकार में सिंचाई राज्य मंत्री हैं*

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एक बहुत बड़े सिद्ध संत थे— स्वामी आनंद। उन्होंने वर्षों तक कठिन तपस्या की थी। एक रात उनके स्वप्न में भगवान आए और बोले, “आनंद, तुम्हारी भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ। कल दोपहर मैं स्वयं तुम्हारे आश्रम में भोजन करने आऊंगा।”
स्वामी जी की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने पूरे आश्रम को फूलों से सजवाया, सबसे उत्तम पकवान बनवाए और द्वार पर खड़े होकर भगवान की प्रतीक्षा करने लगे।
तीन अनजान लोग
दोपहर की शुरुआत: सबसे पहले एक बूढ़ी औरत आई, जिसके कपड़े फटे थे और वह भूख से कांप रही थी। स्वामी जी ने उसे जल्दी से कुछ सिक्के दिए और कहा, “माई, आगे जाओ, आज मेरे घर भगवान आने वाले हैं, मैं अभी व्यस्त हूँ।”
दोपहर का मध्य: कुछ देर बाद एक प्यासा राहगीर आया। उसने पानी माँगा। स्वामी जी ने उसे इशारा किया कि पास के कुएं से पी ले और खुद आँखें बिछाए सड़क की ओर देखते रहे कि कहीं भगवान की पालकी न आ जाए।
दोपहर का अंत: अंत में एक छोटा बच्चा आया जिसके पैर में कांटा चुभा था और वह रो रहा था। स्वामी जी ने झुंझलाकर अपने शिष्य से कहा, “इसे मरहम लगा दो और यहाँ से ले जाओ, भगवान के आने का समय निकला जा रहा है!”
शिकायत और सत्य
शाम हो गई, सूरज ढल गया, लेकिन भगवान नहीं आए। स्वामी जी बहुत दुखी हुए। रात को जब वे सोए, तो भगवान फिर सपने में आए।
स्वामी जी ने रुआंसे होकर पूछा, “प्रभु, आपने वादा किया था, पर आप आए क्यों नहीं?”
भगवान मुस्कुराए और बोले:
“आनंद, मैं तो तीन बार तुम्हारे द्वार पर आया था। कभी भूखी बुढ़िया बनकर, कभी प्यासा राहगीर बनकर, तो कभी उस घायल बच्चे के रूप में। लेकिन तुम ‘ईश्वर’ को ढूंढ रहे थे और मेरे ‘रूपों’ को दुत्कार रहे थे।”
स्वामी जी की आँखें खुल गईं। उन्हें समझ आ गया कि मंदिर की मूर्तियों में जो ईश्वर है, वह बाहर खड़े लाचार इंसानों की सेवा के बिना नहीं मिलता।
कहानी की सीख:
भगवान केवल मंत्रों और अनुष्ठानों में नहीं बसते, बल्कि वे उन लोगों की सेवा में बसते हैं जिन्हें दुनिया की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। ‘नर सेवा ही नारायण सेवा है।’

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