: उत्तराखंड में यूसीसी कानून के दो प्रावधानों पर आपत्ति को लेकर पूर्व सैनिक संघर्ष समिति ने प्रेषित किया ज्ञापन।
उत्तराखंड में यूसीसी कानून के दो प्रावधानों – लिव-इन संबंधों और स्थाई निवास अधिकार पर हम आपत्ति दर्ज करते हैं।
हम कोटद्वार की बुद्धिजीवियों के द्वारा एक ज्ञापन महामहिम राष्ट्रपति महोदय और मुख्यमंत्री उत्तराखंड सरकार को प्रेषित किया गया है, जिसमें हमने लिव-इन रिलेशन और स्थाई निवास के प्रावधानों को हटाने के लिए निवेदन किया है।

महेंद्र पाल सिंह रावत।
उपाध्यक्ष
ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ वेटरन एसोसिएशन (पंजीकृत)।।।
विषय :. उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (यू.सी.सी) के प्रवर्तन पर श्रेत पत्र
महोदय,
. (यू.सी.सी) 28 जनवरी 2025 से लागू हो गयी है, और जिससे राज्य में व्यापक चर्चा और बहस छिड़ गई है। यद्यपि यू.सी.सी का उद्देश्य कानूनी समानता और लैंगिक न्याय सुनिश्चित करना
है, परंतु इसके कुछ प्रावधान-विशेष रूप से लिव-इन संबंधों, स्थायी निवास (डोमिसाइल) और भूमि स्वामित्व से जुड़े नियम-उत्तराखंड की पारंपरिक सामाजिक संरचना और सनातन मूल्यों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।
यह श्ेत पत्र विशेष रूप से इन प्रावधानों के कारण होने वाले सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों के क्षरण, पारिवारिक संस्थाओं के विघटन और राज्य की सांस्कृतिक पहचान पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करता है। साथ ही, यह इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि किस प्रकार (यू.सी.सी के कारण उत्तराखंड की जनसंख्यिकीय संरचना और आर्थिक स्थिति में असंतुलन उत्पन्न हो सकता है।
2… समान नागरिक संहिता का उद्देश्य विभिन्न धार्मिक समुदायों के अलग-अलग वैयक्तिक कानूनों को समाप्त कर, सभी नागरिकों के लिए समान नियम लागू करना है। इस संहिता के समधेंकों का मानना है कि इससे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने से जुड़े मामलों में न समानता आएगी और संविधान के का के समक्ष समानता” के सिद्धांत को बल मिलेगा।
परंतु आलोचकों का कहना है कि यह सिर्फ कानूनी समानता स्थापित करने का प्रयास नहीं है, बल्कि भारतीय समाज के गहरे नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों को दरकिनार करने का एक
माध्यम बन सकता है। विशेष रूप से लिव-इन संबंधों को कानूनी मान्यता देने वाले प्रावधान को लेकर कड़ी आपत्ति व्यक्त की जा रही है, क्योंकि यह हिंदू विवाह की पवित्रता और परिवार
व्यवस्था पर सीधा प्रहार करता है:-
(क). सनातन धर्म और पारंपरिक हिंद्र मूल्यों पर आक्रमण, सनातन धर्म में विवाह केवल एक कानूनी अनुबंध नहीं; बल्कि एक पवित्र संस्कार है, जो धार्मिक कर्तव्यों और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा हुआ है। (यू.सी.सी) के अंतर्गत लिव-इन संग को कानूनी मान्यता देना इस व्यवस्था के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।
(ख) _ विवाह की पवित्रता को कमजोर करना. _ हिंदू समाज में विवाह जीवनभर की प्रतिबद्धता होती है, जो केवल पति-पत्नी तक सीमित न रहकर, पूरे परिवार और समाज की नींव को मजबूत करता है। लिव-इन संबंधों को मान्यता देने से विवाह की
पवित्रता समाप्त हो जाएगी और जिम्मेदारी तथा नैतिकता का स्थान अस्थायी संबंध ले लेंगे।
पश्चिमी देशों में जहां विवाह एक कानूनी अनुबंध बन गया है, वहीं भारतीय समाज में यह धर्म और संस्कृति की रीढ़ बना हुआ है। यदि लिव-इन को विवाह के समकक्ष माना जाएगा, तो यह हिंदू समाज की मूल अवधारणा को हानि पहुंचाएगा।
(ग)… नैतिक पतन और सांस्कृतिक क्षरण को बढ़ावा तिक क्षरण को बढ़ावा. _ (0८८ के इस प्रावधान से नैतिक मूल्य कमजोर हो मर हैं और अस्थायी संबंधों को बढ़ावा मिलेगा, जिससे पारिवारिक ढांचे का विघटन हो सकता है। सनातन धर्म में परिवार केवल रक्त संबंध
नहीं, बल्कि समाज का आधार स्तंभ होता है। लेकिन लिव-इन संबंधों को वैधता देने से “क्षणिक सुख” की संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा, जिससे सामाजिक अस्थिरता, पारिवारिक विघटन और बच्चों के अधिकारों का हनन हो सकता है।
अन्य राज्यों में जहां पहले से ही लिव-इन को कानूनी मान्यता मिली है, वहां ऐसे मामलों में वृद्धि देखी गई है, जहां पुरुष साथी महिलाओं और बच्चों को छोड़कर चले जाते हैं। उत्तराखंड के पारंपरिक समाज को इस तरह की समस्याओं से बचाना आवश्यक है।
(ग).. देह व्यापार और अनैतिक कृत्यों को बढ़ावा देने का खतरा. उत्तराखंड के ग्रामीण और धार्मिक समाज में गहरी चिंता है कि लिव-इन को कानूनी हा देने से यह राज्य भी “यौन पर्यटन” (56८ ग०णांधा0) का केंद्र बन सकता है, जैसा कि बैंकॉक और पटाया जैसे शहरों में हुआ है। उत्तराखंड अपनी आध्यात्मिक और
सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है। यदि लिव-इन संबंधों को पूरी कानूनी सुरक्षा दी जाती है, तो इसका गलत लाभ उठाकर बाहरी तत्व इसे अनैतिक गतिविधियों का अड्डा बना सकते हैं।
3
(घ) _ नागरिकता और भूमि स्वामित्व से जुड़े जोखिम… ८८ के अंतर्गत
नागरिकता और भूमि स्वामित्व से जुड़े नए नियम भी जनसांख्यिकी और आर्थिक
संतुलन के लिए खतरा उत्पन्न कर सकते हैं।
4… जनसांख्यिकीय असंतुलन और सांस्कृतिक पहचान का हास. _ 0८0 के अंतर्गत
लिव-इन संबंधों की मान्यता का उपयोग एक रणनीतिक जनसांख्यिकीय परिवर्तन
(0ह्ञा०0पागां८ ।/गा00व00) के लिए किया जा सकता है, जिससे स्थानीय हिंदू समुदाय
हाशिए पर आ सकता है। इस तरह की नीतियों से उत्तराखंड की असली सांस्कृतिक पहचान
और धार्मिक संतुलन को क्षति पहुंच सकती है, जिससे आने वाले वर्षों में इसके सामाजिक और
राजनीतिक परिदृश्य में अप्रत्याशित बदलाव हो सकते हैं।
- …. सुझाव एवं समाधान. ७८८ को संतुलित और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत
को संरक्षित करने योग्य बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने आवश्यक हैं :-
… (क). लिव-इन संबंधों को कानूनी मान्यता से बाहर रखा जाए. उत्तराखंड की
सांस्कृतिक और नैतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए, इस प्रावधान को हटा दिया जाना
चाहिए।
(ख) स्थायी निवास और भूमि स्वामित्व पर सख्त नियंत्रण. बाहरी व्यक्तियों
को लिव-इन संबंधों के आधार पर नागरिकता और भूमि स्वामित्व का दावा करने से
रोकने के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं।
(ग) सार्वजनिक विमर्श और जनमत संग्रह. (८८ को लागू करने से पहले
व्यापक जनसंवाद किया जाए और विभिन्न समुदायों की भावनाओं का सम्मान किया
जाए।
(घ) …. नैतिक शिक्षा को बढ़ावा. . युवाओं को पारिवारिक मूल्यों और सनातन
संस्कृति का महत्व समझाने के लिए शिक्षा प्रणाली में आवश्यक सुधार किए जाएं।



