जगदीश बकरोला जिसने पहाड़ के लोक के गीत गाये चुप चाप चले गये : नब्बे के दशक में जब टेप रिकॉर्डर और कैसेट्स का दौर था तो उस दौर में जगदीश बकरोला के गढ़वाल के लोक जीवन के गीत घर घर तक लोकप्रिय हो गये बेहद गरीब साधारण परिवार में जन्मे जगदीश बकरोला ने गढ़वाल के लोक जीवन से जुड़ी समस्याओं को, युवा मन की उमंगो प्रेम, उल्लास और उमंग, पहाड़ की महिलाओं के पहाड़ की भांति कठोर जीवन, अपने पति के साथ नौकरी पर दिल्ली जाने की जिद, पहाड़ की महिलाओं के जीवन संघर्ष और गाय बकरी नैयार नदी सतपुली शहर उनके गीत लोक जीवन के इन्हीं पहलुओं के बीच सामंजस्य बनाये रहे, जगदीश बकरोला स्वर्गीय चन्द्र सिंह राही की तरह लोक जीवन को अपने गीतों मे उकेरने वाले लोक कलाकार थे उन्होंने स्टेज कार्य क्रमों के लिए लाखों की डिमांड आयोजक मंडलों से नही की जो मिला जहाँ अवसर मिला गढ़वाल की लोक संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए उतर गये, हालांकि आज की युवा पीढ़ी संरक्षण के अभाव में तथा टेप रिकॉर्डर कैसेट्स के उस दौर को नही देखी है लेकिन गढ़वाल में नब्बे के दशक में आकाशवाणी नजीबाबाद से ग्राम जगत, गिरि गुंजन, लखनऊ से उत्तरायण जैसे गढ़वाली लोक संगीत के कार्यक्रम से घर घर में लोकप्रिय थे। स्वर्गीय जगदीश बकरोला जी ने पप्पू का पिताजी अईं च नैयार हम भी आणा छावां दहड़ तुम्हार, सनका बांद, लाला मनसा राम, सतपुली बाजर क्यो आंदी मेरी बुआरी कि मति, नकपोड़ी लाल किलै, जैंसे कई लोकप्रिय गीत गाये उस दौर में सोनोटोन, नीलम कैसेट्स, टी सीरीज जैंसी कैसेट्स निर्माता कंपनियों की लाखों कैसेट्स इन लोकप्रिय लेक कलाकारों के गीतों के चलते बाजार मे धड़ाधड़ बिकने लगी थी, स्वर्गीय जगदीश बकरोला ने गढ़वाल की लोक संस्कृति की अपने गीत संगीत के माध्यम से बहुत बड़ी सेवा की है लोक जीवन को, पहाड़ के पहाड़ की तरह के कठिन जीवन संघर्ष को अपने गीत के माध्यम से पहाड़ के आम जनमानस तक पहुंचाने वाले इस लोक प्रिय गीतकार का चुपचाप इस लोक से परलोक गमन पहाड़ के लोक संस्कृति के लिए निश्चित रूप से अपूर्णीय क्षति है।।। अजय तिवाड़ी।।
*पहाड़ के लोक जीवन के मर्म को अपने गीतों के माध्यम से उकेरने वाले लोकप्रिय गायक जगदीश बकरोला का निधन गढ़वाल की लोक संस्कृति की अपूर्णीय क्षति। श्रद्धांजलि* *अजय तिवाड़ी सम्पादक अलग खबर डाटकाम*
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