बिशेष लेख : ऋषि कण्डवाल ( लेखक उत्तराखण्ड सरकार में सिंचाई राज्यमंत्री हैं)
भारतीय समाज में परीक्षा परिणाम केवल शैक्षणिक उपलब्धि का सूचक नहीं रह गया है, अपितु यह अब सामाजिक प्रतिष्ठा, पारिवारिक सम्मान तथा भविष्य की संभावनाओं का मानक बना दिया गया है। प्रत्येक वर्ष बोर्ड परीक्षाओं, प्रतियोगी परीक्षाओं अथवा प्रवेश परीक्षाओं के परिणाम घोषित होते ही लाखों छात्र-छात्राएँ आशा, भय, असुरक्षा और मानसिक दबाव के भँवर में फँस जाते हैं। अंकपत्र का एक छोटा-सा अंक मानो उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व, प्रतिभा और भविष्य का निर्णयकर्ता बन बैठता है। यह प्रवृत्ति न केवल चिंताजनक है, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता का भी द्योतक है।
वर्तमान समय में शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन से अधिक प्रतिस्पर्धा में विजय प्राप्त करना बन गया है। माता-पिता अपने अधूरे स्वप्नों को संतानों के माध्यम से पूर्ण करने का प्रयास करते हैं। फलस्वरूप छात्र-छात्राओं पर अपेक्षाओं का असहनीय बोझ लद जाता है। “प्रथम आना है”, “अधिक अंक लाने हैं”, “फलाँ के बच्चे से बेहतर करना है” जैसी निरंतर तुलनाएँ बालमन को भीतर तक आहत कर देती हैं। यह मानसिक दबाव धीरे-धीरे तनाव, अवसाद, आत्मग्लानि और आत्मविश्वास के क्षरण का कारण बनता है।
वास्तविकता यह है कि प्रत्येक बालक की क्षमता, अभिरुचि और बौद्धिक प्रकृति भिन्न होती है। कोई गणित में प्रवीण होता है तो कोई कला, संगीत, साहित्य अथवा खेल में असाधारण प्रतिभा रखता है। किंतु दुर्भाग्यवश हमारा समाज सफलता का मापदंड केवल अंक और प्रतिशत को मान बैठा है। परिणामस्वरूप जिन विद्यार्थियों के अंक अपेक्षा के अनुरूप नहीं आते, वे स्वयं को असफल और निरर्थक समझने लगते हैं। कई बार यह मानसिक स्थिति इतनी भयावह हो जाती है कि विद्यार्थी आत्मघाती कदम उठाने तक विवश हो जाते हैं। यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज की नैतिक पराजय है।
परीक्षा परिणाम के समय पारिवारिक वातावरण भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि घर में निरंतर दबाव, तुलना और आलोचना का वातावरण हो, तो छात्र मानसिक रूप से टूटने लगता है। दूसरी ओर यदि परिवार सहयोग, संवाद और आत्मीयता का वातावरण प्रदान करे, तो विद्यार्थी असफलता में भी साहसपूर्वक आगे बढ़ने की प्रेरणा प्राप्त करता है। माता-पिता को यह समझना होगा कि संतान कोई मशीन नहीं, बल्कि संवेदनशील भावनात्मक व्यक्तित्व है, जिसे प्रेम, विश्वास और प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है।
मानसिक तनाव से मुक्त रहने हेतु विद्यार्थियों को भी कुछ आवश्यक बातों को आत्मसात करना चाहिए। सर्वप्रथम यह समझना आवश्यक है कि परीक्षा जीवन का एक छोटा-सा चरण मात्र है, सम्पूर्ण जीवन नहीं। अंक व्यक्ति की योग्यता का अंतिम सत्य नहीं होते। नियमित दिनचर्या, पर्याप्त विश्राम, सकारात्मक चिंतन, योग एवं ध्यान मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक सिद्ध होते हैं। विद्यार्थियों को अपनी रुचियों के अनुरूप समय देना चाहिए तथा असफलता को सीखने की प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करना चाहिए।
विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की भी यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे केवल परिणाम आधारित शिक्षा प्रणाली को बढ़ावा न दें, बल्कि विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी समान ध्यान दें। परामर्श सत्र, प्रेरणात्मक संवाद और तनाव प्रबंधन की कार्यशालाएँ समय की आवश्यकता बन चुकी हैं। शिक्षा तभी सार्थक कही जाएगी जब वह विद्यार्थियों को केवल रोजगार नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाए।
समाज को यह स्वीकार करना होगा कि जीवन की सफलता केवल अंकों के प्रतिशत से निर्धारित नहीं होती। इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक महान व्यक्तित्व पारंपरिक परीक्षाओं में साधारण रहे, किंतु अपने संकल्प, प्रतिभा और परिश्रम से उन्होंने विश्व में अमिट छाप छोड़ी। अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम बच्चों को अंक प्राप्त करने की मशीन नहीं, बल्कि स्वतंत्र विचारशील और आत्मविश्वासी नागरिक बनने दें।
परीक्षा परिणाम उत्सव का विषय हो सकता है, किंतु उसे भय, अवसाद और सामाजिक दबाव का कारण बना देना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। अब समय आ गया है कि अभिभावक, शिक्षक और समाज मिलकर ऐसी सकारात्मक व्यवस्था निर्मित करें, जहाँ विद्यार्थी अंक नहीं, अपने व्यक्तित्व और संभावनाओं के आधार पर पहचाने जाएँ। तभी शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होगा और हमारा युवा वर्ग मानसिक रूप से स्वस्थ, आत्मविश्वासी तथा सशक्त बन सकेगा।


