वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में सौभाग्यवती महिलाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है।
यह व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस कथा में सती सावित्री के त्याग, पतिव्रत धर्म और दृढ़ संकल्प का वर्णन है, जिन्होंने अपने मृत पति के प्राण यमराज से वापस ले लिए थे।
प्राचीन काल में मद्र देश के राजा अश्वपति थे। उनकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने विधि- विधान से १८ वर्षों तक तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर देवी सावित्री ने उन्हें एक कन्या का वरदान दिया। कन्या का नाम सावित्री रखा गया। सावित्री जब विवाह योग्य हुई, तो उसने स्वयं तपोवन में रह रहे राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना।

जब सावित्री ने अपने चयन के बारे में अपने पिता को बताया, तो वहां उपस्थित देवर्षि नारद ने कहा कि सत्यवान अल्पायु हैं और ठीक एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु निश्चित है। राजा अश्वपति चिंतित हो गए और सावित्री को किसी और को चुनने की सलाह दी, लेकिन सावित्री ने दृढ़ता से कहा—
“आर्य कन्याएं अपना पति एक बार ही चुनती हैं।”
सावित्री और सत्यवान का विवाह हो गया। सावित्री अपने राजमहल के सुख छोड़कर सत्यवान के साथ वन में रहने लगीं।
जैसे-जैसे सत्यवान की मृत्यु का समय निकट आया, सावित्री ने तीन दिन पूर्व ही उपवास और तप शुरू कर दिया।
नारद जी द्वारा बताए गए दिन, जब सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जंगल में गए, तो सावित्री भी उनके साथ गईं। जंगल में सत्यवान के सिर में तेज दर्द हुआ और वे एक वट वृक्ष (बरगद) के नीचे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। कुछ ही देर में उनके प्राण निकल गए।
सत्यवान के प्राण लेने के लिए स्वयं यमराज आए। जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे, तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगीं। यमराज ने उन्हें वापस जाने को कहा, लेकिन सावित्री ने अपनी बुद्धिमानी और तर्कों से यमराज को प्रभावित किया।
सावित्री के पतिव्रत धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा (सत्यवान के प्राणों को छोड़कर):
- पहला वरदान: सावित्री ने अपने ससुर की आंखों की ज्योति वापस मांगी।
- दूसरा वरदान: उन्होंने अपने ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा।
- तीसरा वरदान: सावित्री ने १०० पुत्रों की माता होने का वरदान मांगा।
यमराज ने बिना सोचे “तथास्तु” कह दिया। तब सावित्री ने विनम्रतापूर्वक कहा कि “प्रभु, आप एक पतिव्रता स्त्री को बिना पति के पुत्रवती होने का आशीर्वाद कैसे दे सकते हैं?” यमराज अपनी ही बात के जाल में फंस गए। वे सावित्री की चतुर बुद्धि और निष्ठा से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने सत्यवान के प्राण वापस कर दिए।
सावित्री वापस उसी वट वृक्ष के पास पहुंचीं, जहां सत्यवान का मृत शरीर पड़ा था। सावित्री के स्पर्श से सत्यवान पुन: जीवित हो उठे।
बरगद का पेड़ दीर्घायु और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास इसमें माना गया है।
इस दिन महिलाएं वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं और उस पर सूती धागा लपेटती हैं, जो उनके अटूट रिश्ते का प्रतीक है।
यह व्रत पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए किया जाता है।
मान्यता है कि इस कथा को सुनने मात्र से घर में सुख-समृद्धि आती है और संकट दूर होते हैं।
