*विद्यालयों की पहचान शिक्षा और गुणवत्ता से हो: छात्र–छात्राओं के धार्मिक प्रतीकों पर छिड़ी बहस* आदर्श वाक्य शिक्षार्थ आइये सेवार्थ जाइए* की भावना के तहत यह है आविभावकों की राय देखें पूरी खबर*

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विद्यालयों की पहचान शिक्षा और गुणवत्ता से हो: छात्र–छात्राओं के धार्मिक प्रतीकों पर छिड़ी बहस

देशभर में विद्यालयों में छात्र–छात्राओं द्वारा धार्मिक प्रतीक पहनकर आने को लेकर चल रही बहस के बीच शिक्षा जगत से जुड़े अनेक लोगों ने स्पष्ट कहा है कि विद्यालयों की वास्तविक पहचान उनकी शिक्षा व्यवस्था, अनुशासन, संस्कार एवं गुणवत्ता से होनी चाहिए, न कि विद्यार्थियों के धार्मिक प्रतीकों से।

शिक्षाविदों का मानना है कि विद्यालय वह स्थान है जहाँ सभी धर्मों, वर्गों एवं समुदायों के छात्र समान रूप से शिक्षा ग्रहण करते हैं। ऐसे में विद्यालयों में समानता, एकरूपता एवं अनुशासन बनाए रखना आवश्यक है। उनका कहना है कि शिक्षा संस्थानों का प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थियों का बौद्धिक एवं नैतिक विकास करना होना चाहिए।

कई अभिभावकों ने भी मत व्यक्त किया कि विद्यालयों में पढ़ाई का वातावरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। यदि शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर होगी तो विद्यालय अपनी उपलब्धियों एवं परिणामों से पहचाना जाएगा। वहीं कुछ सामाजिक संगठनों ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए, किन्तु विद्यालयों के नियमों और अनुशासन का पालन भी आवश्यक है।

विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान समय में शिक्षा संस्थानों को राजनीति एवं धार्मिक विवादों से दूर रखते हुए विद्यार्थियों के भविष्य, आधुनिक शिक्षा और नैतिक मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।अलग खबर डाटकाम ने इस संदर्भ में कई अभिभावकों से बात की अंकित नेगी जो स्वंय एक राजकीय विद्यालय में शिक्षक हैं साथ ही अविभावक भी हैं उनका कहना है कि मैं सिर्फ विद्यालय का शैक्षणिक वातावरण और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण संस्थान को प्राथमिकता दूंगा, धर्म हमारे लिए निज विश्वास का विषय है और विद्यालय में जिस तरह एक समान ड्रेस होती है उसी तरह धार्मिक या मजहबी प्रतीकों को लेकर विद्यालयों में राजनीति नही होनी चाहिए, अविभावक विजय चमोली का मत है कि धर्म को शिक्षण संस्थानों पर थोपना या धार्मिक मजहबी प्रतीक घर या धार्मिक मजहबी आयोजनों में ही उपयोग में लाये जायें हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और अच्छे विद्यार्थी बनाने के लिए भेजते हैं स्कूलों पर इस तरह की राजनीति अस्वीकार्य है, अभिभावक रामकृष्ण जदली भी इसी तरह का मत रखते हैं वै कहते हैं कि एक प्रतिष्ठित तथा शिक्षा के क्षेत्र में अलग पहचान रखने वाले विद्यालय में हम अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए भेजते हैं धर्म घर समाज और धार्मिक स्थलों पर सही है विद्यालय को इस तरह की राजनीति में घसीटना बहुत गलत है। वहीं अभिभावक सुमित भारद्वाज का मत है कि विद्यालयों को उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि और शैक्षणिक वातावरण के लिए जाना जाना चाहिए उन्हें राजनीति का अखाड़ा बनाने के प्रयास गलत हैं।।।

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