*भारतीय राजनीति की दिशा तय करने का दम भरने वाली विदेशी ताकतों को हद दिखाने की आवश्यकता है* *अजय तिवाडी़

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क्या विदेशी ताकतों की कठपुतली हैं विकासशील देश : एक सार्वभौमिक देश की नियति तय करना उस देश के नागरिकों के हाथ होता है या ताकत के दम पर दुनिया को धमकाने वाले देशों के हाथ, ये बेहद गम्भीर मुद्दा है जिसे हर भारतीय को चाहे वह किसी भी राजनीतिक या धार्मिक विचारधारा का व्यक्ति हो उसे सोचने पर मजबूर कर देगा कि दुनिया को संप्रभुता, स्वतंत्रता की सीख देने वाले देश किस तरह आर्थिक तथा सैन्य ताकत में कम देशों में राजनीतिक हस्तक्षेप कर सत्ता परिवर्तन, आंतरिक विद्रोह, उपद्रव कर दूसरे देशों में ऱाजनीतिक अस्थिरता और उपद्रव पैदा कर इन देशों को कमजोर कर देते है। मौजूदा विश्व पटल पर रूस यूक्रेन युद्ध को लें दो देशों का संघर्ष जिसमें रूस को कमजोर करने के लिए पूर्व मे सोवियत रूस का हिस्सा रहे यूक्रेन के नाटो जैसे अमेरिका परस्त समूह में शामिल होने की जिद्द तथा साम्यवादी रूस के अस्तित्व के लिए खतरा बनने की जिद्द का परिणाम था, यद्यपि रूस यूक्रेन युद्ध को देखें तो यह दो देशों की पेशेवर सेनाओं का युद्ध है जिसमें असैनिक क्षेत्र और आम लोगों की जिंदगी की सुरक्षा को क्षति नही हो रही है लेकिन सैनिक संघर्ष और सैन्य प्रतिष्ठान तबाह हो रहे हैं। युद्ध किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को बहुत लम्बे समय तक प्रभावित कर देते हैं रूस अमेरिका द्वारा लगाये गये प्रतिबंध से आर्थिक नुकसान झेल रहा है यदि वैश्विक परस्थितियों में देखें तो इसके लिए अमेरिका की नीतियां ही हैं यद्यपि चीन पर अमेरिका हाथ नही डाल रहा है और नही उसकी ताकत के बूते डालने का दुस्साहस करेगा लेकिन रूस और भारत के विरुद्ध वह खुलकर बयान दे रहा है। अगर बात करें भारत की तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक भविष्य को प्रभावित करने का बयान अमेरिका का राष्ट्रपति खुले आम देता है, अब डोनाल्ड ट्रंप के बयान के मायने निकाले तो सीधे तौर पर वह यह इंगित कर रहे हैं कि भारत के राजनीतिक क्षेत्र पर अमेरिका का प्रभाव है जिसे चाहे वह सरकार में बैठा दे या सत्ता से उखाड़ फेंके यह बेहद ही परेशान करने वाला बयान है, यद्यपि भारतीय राजनीतिक हालत जिस तरह से हैं देश के राजनीतिक दलों ने इस बयान पर प्रतिक्रिया नही दी या यूँ कहें प्रतिक्रिया देने की हिम्मत नही दिखाई। भारत को रूस से सस्ते दाम पर पैट्रोलियम पदार्थ मिल रहे हैं जिससे कि भारत के अरबों रुपये बच रहे हैं लेकिन अमेरिका चाहता है भारत रूस से तेल ना खरीदे आखिर एक संप्रभु देश को आप राजनीतिक आर्थिक रूप से धमकाने वाले होते कौन हो यह विषय अलग है कि भारत की जनता किस राजनीतिक दल को देश की बागडोर सौंपती है यह तय करना भारतीय जनमानस का है अमेरिका का नही लेकिन बांग्लादेश में तथा नेपाल में जो कुछ हुआ इससे भारतीय जनता को बहुत सतर्क हो जाना चाहिए कि विदेशी ताकतों को हमारे देश में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से रोका जाना चाहिए, सत्ता पर कौन शासन करेगा यह तय भारत की जनता करेगी सरकारें आयेंगी जायेंगी यह भारत की जनता का फैसला होगा, विदेशी ताकतों को धनबल से देश के अंदर कुचक्र रचने उपद्रव मचाने अशांति फैलाने तथा राजनीतिक अस्थिरता फैलाने से रोकने के लिए देश के हर युवा हर संवेदनशील व्यक्ति को बेहद सतर्क हो जाना चाहिए अमेरिका के राष्ट्रपति का भारतीय प्रधानमंत्री के राजनीतिक भविष्य तय करने का बयान हर भारतीय को गंभीरता से लेना होगा यह भारत की स्वतंत्रता सार्वभौमिकता तथा संप्रभुता का सवाल है भारत बांग्लादेश या नेपाल नही है हम भारतीय अपने राजनीतिक नेतृत्व का चयन खुद करेंगे कोई विदेशी ताकतों को इसका अधिकार भारत की जनता स्वीकार नही करेगी।

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