अतिक्रमण एक समुदाय के लिए आजीविका का माध्यम दूसरे के लिए अवरो
अतिक्रमण एक समस्या नहीं, दबंगता, भ्रष्टाचार और सरकारी तंत्र की मिलीभगत से एक सरकारी बीमारी है जो लगातार शहर दर शहरों की खूबसूरती को निगल रही है। कोटद्वार इससे अछूता नहीं है।

कल देहरादून मे सर्वे ऑफ इंडिया ऑफिस के आस पास सड़कों पर अतिक्रमण देख कर लगा कि सृष्टि के निर्माता भगवान विश्वकर्मा ने कितना सुंदर भारत बनाया था दूसरी ओर आज के राजनीतिक शिल्पकारों यानि राजनेताओं की बेरुखी के कारण दिन प्रति दिन शहरों की खूसूरती को अतिक्रमण के माध्यम से बिगड़ा जा रहा है आलम यह हैं कि सरकारी ऑफिसों की दीवारों, सड़कों पर निष्कंटक होकर अतिक्रमणकारियों के द्वारा टेली, सब्जी की दुकानें लगा रखी है जिससे प्रतीति होता है कि इनको राजनीतिक संरक्षण और शासन प्रशासन की मूक सहमति प्राप्त है यही नहीं अतिक्रमणकारियों का वोट चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों के लिए संजीवनी या जीत और हार का निर्धारण करती है इसीलिए कह सकते हैं कि कोटद्वार का अतिक्रमण कोर्ट के आदेश के बाद भी हटाने के लिए किसी के पास इच्छाशक्ति नहीं है। क्योंकि इसी वोट बैंक के माध्यम से राजनीति बिसात को बिछाया जाता है जिसकी परिणीति आज पूरे कोटद्वार के अंदर जितने भी नाले और गालियां है उन पर पूर्ण तरह से अतिक्रमण आच्छादित है जिसके कारण कोटद्वार का ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है अगर इस व्यवस्था को ठीक करना है तो कहीं ना कहीं राजनीति से ऊपर उठकर एक ऐसे नेतृत्व को राजनीतिक पटल पर लाना होगा जो पूर्ण रूप से जनता से जनता के लिए समर्पित हो और कोटद्वार की व्यवस्था को सुधार सके इस पर हम सबको विचार करना होगा




