परिसीमन विधेयक एक राजनीतिक लाभ की कुंजी जो उत्तराखंड के मूल आत्मा को खत्म कर देगी…….

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परिसीमन विधेयक एक राजनीतिक लाभ की कुंजी जो उत्तराखंड के मूल आत्मा को खत्म कर देगी…….

मित्रों,
लोक सभा और राज्यो की विधान सभाओं की सीटों में बढ़ोतरी के लिए परिसीमन के प्रस्ताव को लेकर केंद्र सरकार इसी सत्र में आ रही है जिसके माध्यम से मौजूदा संसद सदस्यों की संख्या 543 से बढ़कर 850 करने की केंद्र सरकार की कोशिश है इसी तरह उत्तराखंड में 70 से 105 विधान सभा सीटें होंगी। इसके लिए केंद्र सरकार संसद में तीन विधेयक पेश करेगी
(क) संविधान संशोधन 131 वर्ष 2026
(ख) परिसीमन विधेयक 2026
(ग) संघ शासित क्षेत्र कानून संशोधन विधेयक 2026

क्या है परिसीमन– (Delimitation) का अर्थ है, जनसंख्या में बदलाव के आधार पर लोकसभा या विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करना या बदलना। यह एक संवैधानिक प्रक्रिया (अनुच्छेद 82) है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर क्षेत्र में जनसंख्या के अनुसार बराबर प्रतिनिधित्व हो।

क्यों जनसंख्या आधारित परिसीमन उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य के लिए अभिशाप है जनसंख्या आधारित परिसीमन उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य के लिए एक ‘अभिशाप’ माना जा रहा है क्योंकि यह पर्वतीय क्षेत्रों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कम कर मैदानी जिलों को मजबूत करेगा। पलायन के कारण पर्वतीय आबादी घटने से सीटों का कम होना, विषम भौगोलिक स्थितियों की अनदेखी और विकास में असमानता इसके मुख्य कारण हैं, जो 2008 की तरह ही 8 पहाड़ी सीटों के नुकसान (2027) का खतरा बढ़ाते हैं यह पर्वतीय क्षेत्रों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कम कर मैदानी जिलों को मजबूत करेगा। पलायन के कारण पर्वतीय आबादी घटने से सीटों का कम होना, विषम भौगोलिक स्थितियों की अनदेखी और विकास में असमानता।
भौगोलिक दुर्गमता की अनदेखी – पहाड़ का क्षेत्रफल मैदानी जिलों की तुलना में बहुत अधिक है और यहां आबादी बिखरी हुई है। जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व तय करने से एक विधायक को बहुत बड़े और भौगोलिक रूप से दुर्गम क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करना होगा, जो विकास कार्यों के लिए अव्यावहारिक है।

मैदानी क्षेत्रों का वर्चस्व – देहरादून, हरिद्वार और उधम सिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में जनसंख्या घनत्व अधिक है, जिसके कारण परिसीमन में सीटें इन्हीं क्षेत्रों में बढ़ेंगी। इससे राज्य की सत्ता में पहाड़ों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा।

राज्य निर्माण के मूल उद्देश्य का ह्रास:– उत्तराखंड का गठन पहाड़ी संस्कृति, जरूरतों और विकास के लिए किया गया था। यदि निर्णय लेने की शक्ति मैदानी इलाकों के पास होगी, तो पहाड़ों की उपेक्षा बढ़ेगी।
विकासात्मक असमानता: कम सीटें होने का मतलब है कि पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं को राज्य विधानसभा में कम आवाज मिलेगी, जिससे सड़कें, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे विकास कार्य और पिछड़ जाएंगे। उत्तराखंड में आगामी परिसीमन (Delimitation) केवल जनसंख्या के आधार पर होने से पहाड़ी क्षेत्रों की सीटें कम होने और मैदानों में बढ़ने का खतरा है, जो पर्वतीय संस्कृति, भौगोलिक संतुलन और सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है। इसलिए, परिसीमन का आधार जनघनत्व के बजाय क्षेत्रफल, दुर्गम भौगोलिक स्थिति, और सीमावर्ती क्षेत्रों (Border Security) को प्राथमिकता देकर किया जाना चाहिए। परिसीमन के लिए प्रस्तावित भौगोलिक/क्षेत्रीय आधार:
क्षेत्रफल-आधारित (Area-Based): जनसंख्या के बजाय क्षेत्रफल को आधार बनाया जाए, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में आबादी बिखरी हुई है, लेकिन भौगोलिक क्षेत्र बहुत बड़ा है।

दुर्गम परिस्थितियों को प्राथमिकता – विधानसभा सीटों का निर्धारण करते समय पर्वतीय क्षेत्रों की विषम परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाए, ताकि एक विधायक की पहुँच सभी दूरदराज के गाँवों तक हो सके।

सीमावर्ती सुरक्षा – चीन और नेपाल से लगी लंबी सीमा वाले जिलों (जैसे पिथौरागढ़, चमोली) की विशिष्ट स्थिति को देखते हुए यहाँ प्रतिनिधित्व बना रहना जरूरी है।
उत्तर-पूर्वी राज्यों (Northeast States) का मॉडल: विशेषज्ञ और नेता उत्तराखंड के लिए पूर्वोत्तर राज्यों की तरह भौगोलिक आधार पर परिसीमन की मांग कर रहे हैं, न कि केवल जनसंख्या घनत्व के आधार पर।
महिला और स्थानीय निवासी: राज्य के मूल निवासियों के हितों की रक्षा के लिए डोमिसाइल (निवास) मानक को लागू करने की भी मांग है। यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर हुआ, तो पहाड़ी जिलों में विधानसभा सीटों की संख्या और कम हो सकती है, जिससे उत्तराखंड के गठन का मूल उद्देश्य (पर्वतीय विकास) प्रभावित होगा।

समाधान की मांग :
उत्तराखंड में लंबे समय से यह मांग उठ रही है कि परिसीमन का आधार केवल जनसंख्या न होकर, भौगोलिक क्षेत्रफल, दुर्गमता और पलायन को भी माना जाए इस लिए हम उत्तराखंड के पांच (निचले) लोक सभा और 3 (उच्च सदन) राज्य सभा के सदस्यों से अपील करना चाहते है कि उपरोक्त विषय पर जन भावनाओं को दोनों सदनों में रखे इसी तरह हम उत्तराखंड के विधान सभा के सदस्यों से अपील करते है आप केंद्र सरकार पर परिसीमन विधेयक को पहाड़ी राज्यों के लिए भौगोलिक रूप से रखे इस में हमें कोई विरोध नहीं है।
आओ पहाड़ विरोधी परिसीमन के लिए अपनी आवाज बुलंद करे।।

महेंद्र
पूर्व महापौर प्रत्याक्षी
नगर निगम कोटद्वार

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