पहाड़ की नारी, देश की पहरेदार – देवभूमि की अनकही गाथा
आलेख– महेंद्रपाल सिंह गोर्ला रावत अध्यक्ष, पूर्व सैनिक संघर्ष समिति, कोटद्वार
प्रस्तावना: तस्वीर जो सब कुछ कह देती है
पहाड़ जैसी मजबूती होती है पहाड़ की नारी…
सुबह से लेकर शाम तक जिम्मेदारियों का बोझ
सर पर घास का गट्ठर, पीठ पर लकड़ी, गोद में बच्चा
फिर भी चेहरे पर शिकन नहीं, हौसले हिमालय से ऊंचे।
यह सिर्फ एक तस्वीर नहीं है। यह उत्तराखंड की आत्मा है। यह उस देवभूमि की कहानी है *जहां हर तीसरा घर फौजी घर* है। जब इस घर का मर्द सरहद पर सीना ताने खड़ा होता है, तो *पहाड़ की नारी ही पूरा पहाड़ संभालती है।* जिसका दोहन राजनीतिक दलों के द्वारा किया जा रहा है।
*खेत से खलिहान तक, सीमा से सरहद तक* पहाड़ की नारी एक साथ कई मोर्चे संभालती है। सुबह की पहली किरण से पहले जागती है, और रात के अंतिम दीये के बाद सोती है। सुबह खेत जाती है, दोपहर में मवेशियों का चारा लाती है, शाम को बच्चों को पढ़ाती है और रात को चूल्हा जलाती है। *पति सरहद पर है, बेटा फौज की ट्रेनिंग में है, और वह खुद इस धरती की पहरेदार है*। सोचिए, जिस घर से जवान सीमा पर लड़ रहा है, अगर उस घर में सामाजिक वैमनस्य की आग लग जाए, तो उस जवान का मनोबल क्या रह जाएगा? इसलिए देवभूमि में शांति सिर्फ राजनीतिक जरूरत नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा की शर्त है।
*जिम्मेदारियों का बोझ, फिर भी मुस्कान* इन महिलाओं ने कभी शिकायत नहीं की। इन्होंने सूखा देखा, पलायन देखा, आपदा देखी। लेकिन पहाड़ नहीं छोड़ा। क्योंकि ये जानती हैं कि अगर इन्होंने हिम्मत हार दी, तो पहाड़ खाली हो जाएंगे और खाली पहाड़ देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं।
यही तो हैं देवभूमि की असली ‘जय जवान, जय किसान’। जवान इनका बेटा है, और किसान ये खुद हैं। एक हाथ में दरांती, दूसरे में बच्चे का हाथ - फिर भी हौसले हिमालय से ऊंचे।
*सम्मान ही असली राष्ट्रवाद है* – हम अक्सर राष्ट्रवाद की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। लेकिन असली राष्ट्रवाद तो उस मां का सम्मान है जो अपने लाल को देश पर कुर्बान करने के लिए तैयार करती है। *असली राष्ट्रवाद उस पत्नी का सम्मान है जो करवा चौथ का व्रत तो रखती है, पर पता नहीं पति लौटेगा या तिरंगा।*
जब हम छोटे-छोटे पारिवारिक विवादों को सांप्रदायिक रंग देते हैं, तो सबसे बड़ी चोट इन्हीं माताओं-बहनों को लगती है। इनका बेटा सरहद पर हिंदू-मुस्लिम नहीं देखता, वह सिर्फ तिरंगा देखता है। फिर हम पीछे उसके घर को क्यों बांटें?
*अग्निपथ और पलायन– फौजी परिवार का दोहरा दर्द* – आज जब ‘अग्निपथ योजना’ की बात होती है, तो पहाड़ का हर घर चिंतित है। जिस फौजी ने अपना पूरा जीवन देश को दिया, क्या देश उसे 4 साल बाद बेरोजगार बेटा देगा? यह सवाल सिर्फ एक पिता का नहीं, पूरे पहाड़ का है। यह दर्द उस नारी का भी है जो पति के रिटायर होने पर सुकून चाहती थी, पर अब बेटे की नौकरी के लिए चिंतित है और इससे भी बड़ी चिंता यह है कि उत्तराखंड की नारियों का उत्तराखंड से पलायन करना देवभूमि के लिए शुभ संकेत नहीं है। *जो डंडेली, उबरी और गांव कभी गुलजार रहते थे, अब वीरान हो चुके हैं।* जब पहाड़ की पहरेदार ही पहाड़ छोड़ देगी, तो सरहद की हिफाजत कौन करेगा?
राजनीति अपनी जगह है, *लेकिन सेना और पहाड़ की नारी राजनीति से ऊपर हैं। इन्हें दलगत राजनीति का मोहरा मत बनाइए*। मत बचिए पहाड़ जैसी नारी का सम्मान एक साड़ी के लिए इनका सम्मान करिए, इनकी सुनिए। इनके हाथों को मजबूत कीजिए क्योंकि जिस दिन पहाड़ की नारी ने हिम्मत हार दी, जिस दिन पूर्व सैनिक का भरोसा टूट गया, उस दिन न पहाड़ बचेगा, न देश की शान।
याद रखिए – पहाड़ की मजबूती सिर्फ पत्थरों से नहीं, यहां की नारियों के हौसले से है। और देश की सुरक्षा सिर्फ बंदूकों से नहीं, फौजी के परिवार के सुकून से है।
जय हिंद
जय उत्तराखंड
जय नारी शक्ति
महेंद्र पाल सिंह रावत अध्यक्ष पूर्व सैनिक संघर्ष समिति।
पूर्व सैनिक
