तिलू रौतेली – उत्तराखंड की झांसी की रानी, वीरता की जीवंत प्रतिमा
बीरोंखाल की मिट्टी से उठी वह हुंकार, जिसने रणचंडी का रूप धरा ⚔️………….
बीरोंखाल जहाँ मिट्टी भी शौर्य की कथा कहती है
साथियों,
आज अपने पैतृक क्षेत्र ( जन्म स्थान) बीरोंखाल, पौड़ी गढ़वाल की पावन धरती पर वीरबाला तिलू रौतेली की पुण्य-स्मृति को नमन करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। इस भूमि के कण-कण का स्पर्श करते ही अनुभव होता है कि मातृशक्ति कोई कल्पना नहीं, साक्षात् रणचंडी का स्वरूप है। यहाँ की हवा में आज भी तलवारों की खनक और “भैरों रौतेला अमर रहे” का उद्घोष गूँजता है।

कौन थी तिलू रौतेली? 15 वर्ष की आयु, 7 युद्ध, 1 इतिहास
जन्म 8 अगस्त 1661, गाँव गुराड़, पट्टी चौंदकोट, पौड़ी गढ़वाल। पिता भूप सिंह रौतेला, गढ़वाल नरेश फतेह शाह की सेना में भैरों रौतेला के नाम से प्रसिद्ध सेनानायक काल 17वीं शताब्दी – जब कत्यूरी-कुमाऊँ राजा गढ़वाल पर आक्रमण करते थे।
त्रासदी से रणचंडी तक का सफर
तिलू मात्र 15 वर्ष की थी। विवाह तय हुआ। मेहंदी वाले दिन ही समाचार आया – पिता भूप सिंह, दोनों भाई भगत सिंह और पथवा सिंह, कत्यूरी सेना से लड़ते हुए खैरा-गढ़ में वीरगति को प्राप्त हुए।
माँ ने विलाप किया, गाँव रोया। पर तिलू ने मेहंदी वाले हाथों से आँसू पोंछे और तलवार उठा ली। सिंदूर नहीं, रक्त से माँग भरने का प्रण लिया।
गाँव की महिलाओं को ललकारा – *"धैर्य की चूड़ियाँ तोड़ो, खड्ग उठाओ। आज गढ़वाल की बेटियाँ रण में उतरेंगी।"*
सात वर्ष, सात युद्ध, एक अपराजित सेनापति– 15 से 22 वर्ष की आयु तक तिलू ने अपनी महिला वाहिनी के साथ कत्यूरी शासकों को धूल चटाई। इतिहास गवाह है।
- खैरा-गढ़ विजय – पिता-भाइयों की शहादत का बदला। पहला युद्ध, पहली जीत।
2.उमटागढ़ी युद्ध – सल्ट क्षेत्र को मुक्त कराया।
3.सराइखेत विजय – कत्यूरी थाने उखाड़ फेंके।
4.वीरौं-का-खाल दुश्मन को खदेड़कर चौकी स्थापित की। - कौडिया– भिकियासैंण क्षेत्र स्वतंत्र कराया।
- कलिंकाखाल युद्ध – सबसे भीषण संग्राम। तिलू स्वयं घायल हुईं पर झुकी नहीं।
- कांडा विजय – अंतिम युद्ध। गढ़वाल की सीमाएँ सुरक्षित हुईं।
सेना कैसी थी? – 500 वीरांगनाओं की वाहिनी कोई नारी तलवार चलाती, कोई भाला, कोई ढोल बजाकर शत्रु का मनोबल तोड़ती। तिलू घोड़े पर सवार, केसरिया बाना, हाथ में खड्ग – साक्षात् दुर्गा लगती थीं।
वीरगति – पराजय नहीं– 22 वर्ष की आयु में कांडा के युद्ध के बाद तिलू नयार नदी में स्नान करने गईं। थकान, युद्ध के घाव, और नियति। कहते हैं जल-समाधि ले ली। पर गढ़वाल जीतकर, निष्कंटक करके गईं।
कत्यूरी राजा ने कहा था – “गढ़वाल की एक लड़की ने मेरा राज्य हिला दिया। ये झांसी की रानी से कम नहीं।”
बीरोंखाल क्यों जाएँ? क्योंकि यहाँ प्रेरणा बसती है–
आज बीरोंखाल में तिलू रौतेली का भव्य स्मारक है। यहाँ आकर समझ आता है।
- उम्र बाधा नहीं – 15 साल की लड़की ने साम्राज्य हिला दिया। आज की बेटियाँ डॉक्टर, इंजीनियर, फौजी क्यों नहीं बन सकतीं?
- मातृशक्ति = राष्ट्रशक्ति – तिलू ने सिद्ध किया – राष्ट्र की रक्षा केवल पुरुषों का ठेका नहीं। जब-जब देश पुकारेगा, बेटी खड्ग उठाएगी।
- शोक नहीं, शक्ति चुनो – मेहंदी वाले हाथों में तलवार – ये परिवर्तन का प्रतीक है। विपत्ति को विलाप नहीं, विद्रोह दो।
उत्तराखंड बोर्ड में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने वाली दिव्या ज्योति इसरो जाना चाहती है, सार्थक एयरफोर्स। तिलू रौतेली इन सबकी आदर्श हैं। 350 साल पहले एक पहाड़ी बेटी ने जो कर दिखाया, वो आज हर उत्तराखंडी बेटी के डीएनए में है।
उत्तराखंड सरकार से माँग नहीं, हुंकार
- “तिलू रौतेली वीरता पाठ्यक्रम” – कक्षा 6 से 12 तक हर बच्चे को पढ़ाया जाए। ताकि कोई बेटी खुद को कमजोर न समझे।
- 8 अगस्त “मातृशक्ति दिवस” – तिलू जयंती पर राज्य अवकाश, सैन्य परेड, वीरांगना सम्मान।
3.गढ़वाल राइफल्स में “तिलू पलटन” – एक पूर्ण महिला बटालियन, जिसका युद्धघोष हो – “तिलू रौतेली की जय!”
तिलू रौतेली अमर रहें ⚔️
मातृशक्ति जिंदाबाद, उत्तराखंड जिंदाबाद 🇮🇳
जय हिन्द, जय नारी शक्ति
महेंद्र पाल सिंह रावत
अध्यक्ष
पूर्व सैनिक संघर्ष समिति, कोटद्वार
विनम्र प्रार्थना : आओ अपनी बेटी और बेटे को वीरबाला तिलू रौतेली को स्मरण करवाए बस इतना कहें – “बेटा, 15 साल की तिलू कर सकती है, तो तू क्यों नहीं?”
विश्वास मानिए, उस दिन आपकी बेटी के मन में एक दुर्गा जन्म ले लेगी।


