विस्थापन ही एकमात्र विकल्प है,तैड़िया गांव के लिए..
बहुचर्चित व कॉर्बेट नेशनल पार्क के कोर जोन में बसा तैड़िया खसरा खतौनी के हिसाब से ०१जिसके अंतर्गत भैंसाडाबर छछरण,नवाड़,गस्किल रुमट्यलधार व ल्वड़्या का लगभग अठाईस हेक्टेयर क्षेत्र आते हैं जहां अब खेती का बहुतायत भाग वन एवं वन्य जीवों द्वारा हानि से पंद्रह वर्षों से लैंटाना,काली झाड़ी से आच्छादित हो गया है जहां की दुमंजिली गौशालायें,गोट खण्डहरों व यादों तक सीमित रह गई हैं वहीं तैड़िया ०२ मूल गांव में ख्यूणीख्यात,डाण्ड कन्दरण,कन्दुऴ,नवाड़ मल्ला,सिमलखेत,भैलामारौल,भौंर ,दरखास,ढुंगल्यांण,अमखोली,बैड़ाटूण्डूं,खोलीरौल,ख्वेऴी,सकिन्यूंमऴा,उमराखोली,खितरपाल,बड़्याछान्यूं,भुम्याढौंर,हैड़ाडांग,भल्याढौंर,हैड़ागऴ्या,तूणीडांग तिमलाखोली,ज्यठनूं,खिलाणागैर,सिद्धाढौंर,धौड़ा ,देवीढौंर सभी खेती युक्त लगभग तीस हेक्टेयर भूमि अब गैर आबाद हो लैंटाना के आगोश में समा गए हैं।जबकि आवासीय भूभाग में भवन व छिटपुट क्यारी बाड़ी वाला शेष हैं, जहां चालीस परिवारों की आवाजाही बुजुर्गों की कराह की तरह धुंधली सी आबाद चलती दिखाई दे रही है जो कालागढ़ टाइगर रिजर्व के मैदावन रेंज के कम्पार्टमेंट संख्या 32के अंतर्गत आता है। वर्ष 1994-95 में धारा झिरना कोठीरौ के सफल विस्थापन की तरह तैड़िया- पाण्ड व चुकुम को भी वन्य जीवों के लिए विचरण चौड़ के रूप में विकसित करने को लेकर तैड़िया के ग्रामीणों के साथ वर्ष 1999 में प्रभागीय वनाधिकारी समीर सिन्हा द्वारा बैठक में सर्वसम्मति से रखा और विकल्प सहित जमीन के बदले जमीन व मुआवजा देने सहित विकसित गांव का आश्वासन दिया। जिसपर हामी भरते हुए ग्रामीणों ने संघर्ष समिति ग्राम विस्थापन समिति तैयार कर एक बैनर तले शासन प्रशासन के समक्ष अपने अधिकारों के लिए वर्ष 2000 से जागरूक अभियान चलाया

। तबसे लेकर आज तक लगभग वर्ष 2016 में इस अध्याय का पटाक्षेप हो गया जिसमें ग्रामीणों को अनुकूल जमीन व मुआवजा या झांसा देकर विकास के नाम पर विस्थापन से बैकफुट पर आ गए। विस्थापन एवं पुनर्वास समिति तैड़िया के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ अम्बिका प्रसाद ध्यानी का कहना है कि मुख्यमंत्री, सचिव व अन्य उच्चाधिकारियों के साथ क ई मर्तबा की बैठकों का दौर किसी निर्णय तक नहीं पहुंच पाया।साथ ही उच्च न्यायालय में वाद व शासन व ग्रामीणों के गैर सामंजस्य की भेंट चढ़ गया। ग्राम पंचायत प्रधान काण्डा बिनीता ध्यानी ने इस परिप्रेक्ष्य में विधायक दिलीप रावत,निदेशक कॉर्बेट टाइगर रिजर्व डॉ साकेत बडोला व प्रभागीय वनाधिकारी तरुण एस से वार्ता कर गांव में सड़क, विद्युतीकरण व वन्य जीवों से हो रही क्षतिपूर्ति राशि देने,हाथी रोधी दीवार, फेंसिंग बाड़ से जान माल व किसी खतरे से आगाह को सुरक्षा की बात रखी लेकिन विभागीय अधिकारियों ने पल्ला झाड़ते हुए विस्थापन को ही विकल्प बताकर फिर उलझन में डाल दिया है।

