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“देश के लिए शहादत देने वालों में भेदभाव नहीं होना चाहिए”

केंद्र सरकार के अग्निवीर पेंशन संबंधी हलफनामे के विरोध में तथ्यात्मक टिप्पणी………..

मित्रों,
केंद्र सरकार ने बांबे हाई कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि अग्निवीर नियमित सैनिकों के समान नहीं हैं। इसलिए युद्ध या सैन्य अभियान के दौरान मृत्यु होने पर उनके परिजन नियमित सैनिकों के समान पेंशन और मृत्यु लाभ का दावा नहीं कर सकते। यह तर्क ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शहीद हुए अग्निवीर मुरली नाइक की मां ज्योतिबा नाइक की याचिका के जवाब में दिया गया है।
यह दलील कानूनन भले ही अग्निपथ योजना की अल्पकालिक संरचना पर आधारित हो, लेकिन नैतिकता और राष्ट्रीय भावना के धरातल पर यह अस्वीकार्य है।

  1. गोली दुश्मन की यह नहीं पूछती कि तुम अग्निवीर हो या नियमित सैनिक – सीमा पर दुश्मन की गोली यह भेद नहीं करती कि सामने खड़ा जवान 4 साल की सेवा वाला अग्निवीर है या 20 साल की सेवा वाला नियमित सैनिक।
    ऑपरेशन सिंदूर में मुरली नाइक ने भी उसी मोर्चे पर, उसी दुश्मन की गोली का सामना करते हुए अपने प्राण त्यागे। फिर शहादत में भेद क्यों?
  2. अग्निपथ योजना राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लाई गई, तो उसका दायित्व भी राष्ट्रीय होना चाहिए
    केंद्र सरकार का तर्क है कि अग्निपथ एक अल्पकालिक भर्ती योजना है और इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करना है।
    जब उद्देश्य राष्ट्रीय है, तो उसमें जान गंवाने वाले जवान के परिवार को मिलने वाला सम्मान और सुरक्षा भी राष्ट्रीय होनी चाहिए। सेवा की अवधि शहादत की गरिमा तय नहीं कर सकती।
  3. संविधान का अनुच्छेद 14 “समानता का अधिकार” देता है, असमानता का नहीं
    केंद्र ने कहा है कि यह वर्गीकरण अनुच्छेद 14 के तहत संवैधानिक रूप से वैध है। पर अनुच्छेद 14 का मूल सिद्धांत यह है कि समान परिस्थिति वाले व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार हो।
    जब अग्निवीर और नियमित सैनिक दोनों ही एक ही युद्ध क्षेत्र में, एक ही खतरे में, एक ही दुश्मन के सामने खड़े हैं, तो उनकी परिस्थिति समान है। मृत्यु के बाद उनके परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में कोई अंतर नहीं होता।
  4. सैनिक परिवार के लिए पेंशन केवल आर्थिक सहायता नहीं, सम्मान है
    पेंशन केवल पैसे का मामला नहीं है। यह उस परिवार को समाज में दिया जाने वाला सम्मान है जिसने अपने बेटे को देश के लिए खोया है।
    अगर एक शहीद अग्निवीर के परिवार को नियमित सैनिक के परिवार से कम लाभ मिलेगा, तो यह संदेश जाएगा कि देश की सेवा में भी “दर्जे” होते हैं। यह सैनिकों के मनोबल और राष्ट्रभक्ति पर सीधा प्रहार है।
  5. शहादत का कोई कार्यकाल नहीं होता
    (क) 1965, 1971, कारगिल युद्ध में अस्थायी रूप से भर्ती हुए सैनिकों को भी शहीद का दर्जा और पेंशन मिली।

(ख) पैरामिलिट्री, अर्धसैनिक बलों के जवान भी युद्ध में शहीद होने पर शहीद का दर्जा और समकक्ष लाभ पाते हैं।
(ग) तो फिर अग्निवीर के साथ अलग मानक क्यों?
एक राष्ट्र, एक शहीद – देश की रक्षा में प्राण देने वाला हर जवान समान है। चाहे वह 4 साल सेवा करे या 40 साल। जब झंडा एक है, दुश्मन एक है, मातृभूमि एक है, तो शहादत का सम्मान भी एक होना चाहिए।

 अगर आज हम अग्निवीर के परिवार को नियमित सैनिक के समान लाभ नहीं देंगे, तो कल कोई भी युवा वर्दी पहनने से पहले दो बार सोचेगा। और यह देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा।  
  1. हमारी मांग स्पष्ट है — शहीद अग्निवीर के परिवार को भी नियमित सैनिक के समान पेंशन और मृत्यु लाभ मिले। – क्योंकि देश के लिए शहादत देने वालों में कोई भेद नहीं होता। आलेख

महेंद्र पाल सिंह रावत
अध्यक्ष,
पूर्व सैनिक संघर्ष समिति, कोटद्वार

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