उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) के प्रवर्तन पर श्वेत पत्र
परिचय
उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता
(UCC) 28 जनवरी 2025 से लागू हो गयी है, और जिससे राज्य में व्यापक चर्चा और बहस छिड़ गई है। यद्यपि UCC का उद्देश्य कानूनी समानता और लैंगिक न्याय सुनिश्चित करना है, परंतु इसके कुछ प्रावधान—विशेष रूप से लिव-इन संबंधों, स्थायी निवास (डोमिसाइल) और भूमि स्वामित्व से जुड़े नियम— उत्तराखंड की पारंपरिक सामाजिक संरचना और सनातन मूल्यों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।
यह श्वेत पत्र विशेष रूप से इन प्रावधानों के कारण होने वाले सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों के क्षरण, पारिवारिक संस्थाओं के विघटन और राज्य की सांस्कृतिक पहचान पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करता है। साथ ही, यह इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि किस प्रकार UCC के कारण उत्तराखंड की जनसांख्यिकीय संरचना और आर्थिक स्थिति में असंतुलन उत्पन्न हो सकता है।
पृष्ठभूमि
समान नागरिक संहिता का उद्देश्य विभिन्न धार्मिक समुदायों के अलग-अलग वैयक्तिक कानूनों को समाप्त कर, सभी नागरिकों के लिए समान नियम लागू करना है। इस संहिता के समर्थकों का मानना है कि इससे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने से जुड़े मामलों में समानता आएगी और संविधान के "कानून के समक्ष समानता" के सिद्धांत को बल मिलेगा।
परंतु आलोचकों का कहना है कि यह सिर्फ कानूनी समानता स्थापित करने का प्रयास नहीं है, बल्कि भारतीय समाज के गहरे नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों को दरकिनार करने का एक माध्यम बन सकता है। विशेष रूप से लिव-इन संबंधों को कानूनी मान्यता देने वाले प्रावधान को लेकर कड़ी आपत्ति व्यक्त की जा रही है, क्योंकि यह हिंदू विवाह की पवित्रता और परिवार व्यवस्था पर सीधा प्रहार करता है।
सनातन धर्म और पारंपरिक हिंदू मूल्यों पर आक्रमण
सनातन धर्म में विवाह केवल एक कानूनी अनुबंध नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्कार है, जो धार्मिक कर्तव्यों और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा हुआ है। UCC के अंतर्गत लिव-इन संबंधों को कानूनी मान्यता देना इस व्यवस्था के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।
- विवाह की पवित्रता को कमजोर करना
हिंदू समाज में विवाह जीवनभर की प्रतिबद्धता होती है, जो केवल पति-पत्नी तक सीमित न रहकर, पूरे परिवार और समाज की नींव को मजबूत करता है। लिव-इन संबंधों को मान्यता देने से विवाह की पवित्रता समाप्त हो जाएगी और जिम्मेदारी तथा नैतिकता का स्थान अस्थायी संबंध ले लेंगे। पश्चिमी देशों में जहां विवाह एक कानूनी अनुबंध बन गया है, वहीं भारतीय समाज में यह धर्म और संस्कृति की रीढ़ बना हुआ है। यदि लिव-इन को विवाह के समकक्ष माना जाएगा, तो यह हिंदू समाज की मूल अवधारणा को हानि पहुंचाएगा।
- नैतिक पतन और सांस्कृतिक क्षरण को बढ़ावा
UCC के इस प्रावधान से नैतिक मूल्य कमजोर हो सकते हैं और अस्थायी संबंधों को बढ़ावा मिलेगा, जिससे पारिवारिक ढांचे का विघटन हो सकता है। सनातन धर्म में परिवार केवल रक्त संबंध नहीं, बल्कि समाज का आधार स्तंभ होता है। लेकिन लिव-इन संबंधों को वैधता देने से “क्षणिक सुख” की संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा, जिससे
सामाजिक अस्थिरता, पारिवारिक विघटन और बच्चों के अधिकारों का हनन हो सकता है।
अन्य राज्यों में जहां पहले से ही लिव-इन को कानूनी मान्यता मिली है, वहां ऐसे मामलों में वृद्धि देखी गई है, जहां पुरुष साथी महिलाओं और बच्चों को छोड़कर चले जाते हैं। उत्तराखंड के पारंपरिक समाज को इस तरह की समस्याओं से बचाना आवश्यक है।
- देह व्यापार और अनैतिक कृत्यों को बढ़ावा देने का खतरा
उत्तराखंड के ग्रामीण और धार्मिक समाज में गहरी चिंता है कि लिव-इन को कानूनी स्वीकृति देने से यह राज्य भी “यौन पर्यटन” (Sex Tourism) का केंद्र बन सकता है, जैसा कि बैंकॉक और पटाया जैसे शहरों में हुआ है।
उत्तराखंड अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है। यदि लिव-इन संबंधों को पूरी कानूनी सुरक्षा दी जाती है, तो इसका गलत लाभ उठाकर बाहरी तत्व इसे अनैतिक गतिविधियों का अड्डा बना सकते हैं।
नागरिकता और भूमि स्वामित्व से जुड़े जोखिम
UCC के अंतर्गत नागरिकता और भूमि स्वामित्व से जुड़े नए नियम भी जनसांख्यिकी और आर्थिक संतुलन के लिए खतरा उत्पन्न कर सकते हैं।
- स्थानीय भूमि अधिकारों को खतरा
उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से बाहरी व्यक्तियों को कृषि भूमि खरीदने की अनुमति नहीं थी, ताकि स्थानीय समुदायों की आर्थिक सुरक्षा बनी रहे। लेकिन UCC के तहत, यदि कोई गैर-स्थानीय व्यक्ति उत्तराखंड में लिव-इन
संबंध स्थापित करता है, तो वह स्थायी निवास प्रमाण पत्र (Domicile) का दावा कर सकता है और इस आधार पर भूमि खरीदने का अधिकार प्राप्त कर सकता है। इससे स्थानीय लोगों के लिए भूमि की उपलब्धता कम हो सकती है और बाहरी तत्व भूमि पर कब्जा कर राज्य की जनसांख्यिकीय संरचना को प्रभावित कर सकते हैं।
- जनसांख्यिकीय असंतुलन और सांस्कृतिक पहचान का ह्रास
UCC के अंतर्गत लिव-इन संबंधों की मान्यता का उपयोग एक रणनीतिक जनसांख्यिकीय परिवर्तन (Demographic Manipulation) के लिए किया जा सकता है, जिससे स्थानीय हिंदू समुदाय हाशिए पर आ सकता है। इस तरह की नीतियों से उत्तराखंड की असली सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक संतुलन को क्षति पहुंच सकती है, जिससे आने वाले वर्षों में इसके सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में अप्रत्याशित बदलाव हो सकते हैं।
सुझाव एवं समाधान
UCC को संतुलित और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने योग्य बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने आवश्यक हैं:
लिव-इन संबंधों को कानूनी मान्यता से बाहर रखा जाए – उत्तराखंड की सांस्कृतिक और नैतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए, इस प्रावधान को हटा दिया जाना चाहिए।
स्थायी निवास और भूमि स्वामित्व पर सख्त नियंत्रण – बाहरी व्यक्तियों को लिव-इन संबंधों के आधार पर नागरिकता और भूमि स्वामित्व का दावा करने से रोकने के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं।
सार्वजनिक विमर्श और जनमत संग्रह – UCC को लागू करने से पहले व्यापक जनसंवाद किया जाए और विभिन्न समुदायों की भावनाओं का सम्मान किया जाए।
नैतिक शिक्षा को बढ़ावा – युवाओं को पारिवारिक मूल्यों और सनातन संस्कृति का महत्व समझाने के लिए शिक्षा प्रणाली में आवश्यक सुधार
किए जाएं।
निष्कर्ष
उत्तराखंड में UCC का लागू होना कानूनी सुधार और सांस्कृतिक अस्तित्व के बीच एक संघर्ष को जन्म दे सकता है। लिव-इन संबंधों की मान्यता, विवाह की पवित्रता को कमजोर कर सकती है, जिससे सामाजिक मूल्यों का क्षरण और यौन पर्यटन को बढ़ावा मिलने का खतरा है।
यदि उत्तराखंड को अपनी सनातन परंपराओं और हिंदू सांस्कृतिक विरासत
को बनाए रखना है, तो इस कानून को बिना सोचे-समझे लागू करने के बजाय इसे सावधानीपूर्वक और सांस्कृतिक चेतना के साथ संशोधित करना होगा। कानूनी प्रगति और सांस्कृतिक उत्तरजीविता के बीच संतुलन बनाए रखना ही उत्तराखंड की वास्तविक उन्नति होगी।
जय हिंद महेन्द्र पाल सिंह रावत अध्यक्ष पूर्व सैनिक संघर्ष समिति कोटद्वार।



