✍️ महेंद्र पाल सिंह रावत
पूर्व सैनिक, गढ़वाल राइफल्स
अध्यक्ष, पूर्व सैनिक संघर्ष समिति, कोटद्वार
किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा केवल उसकी सीमाओं पर तैनात सैनिकों के साहस से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से भी सुनिश्चित होती है जो उन सैनिकों के सम्मान, अधिकारों और कल्याण की रक्षा करती है। भारत का सैनिक अपने प्राणों की परवाह किए बिना सीमाओं की रक्षा करता है। वह अपना परिवार, व्यक्तिगत सुख और जीवन की अनेक सुविधाएँ त्यागकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखता है। इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि राष्ट्र भी उसके अधिकारों और सम्मान की रक्षा उसी गंभीरता से करे।
दुर्भाग्य से अनेक सैनिकों और पूर्व सैनिकों का अनुभव इससे भिन्न दिखाई देता है। सीमाओं से अवकाश लेकर घर लौटने वाला सैनिक अनेक बार अपने परिवार के साथ समय बिताने के बजाय तहसील, न्यायालय, राजस्व कार्यालय और अन्य सरकारी विभागों के चक्कर लगाने को विवश हो जाता है। भूमि विवाद, पेंशन, सेवा लाभ, प्रशासनिक प्रक्रियाएँ और न्यायिक विलंब उसके बहुमूल्य अवकाश को निगल लेते हैं।
यह केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं है; यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय भी है। जिस सैनिक का मन अपने परिवार की समस्याओं और लंबित मामलों में उलझा रहेगा, उससे पूर्ण मानसिक एकाग्रता और सर्वोच्च प्रदर्शन की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा। सैनिक का मनोबल केवल हथियारों से नहीं, बल्कि इस विश्वास से मजबूत होता है कि उसका राष्ट्र उसके साथ न्याय करेगा।
सेवानिवृत्ति के बाद स्थिति कई बार और अधिक कठिन हो जाती है। जिन लोगों ने अपने जीवन के दो से तीन दशक राष्ट्र की सेवा में समर्पित किए, वे अपने ही अधिकारों के लिए वर्षों तक सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने को विवश हो जाते हैं। यह स्थिति केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि हमारे संवेदनशील लोकतंत्र के लिए भी आत्ममंथन का विषय है।
सैनिकों का सम्मान केवल राष्ट्रीय पर्वों पर पुष्पांजलि अर्पित करने, भाषण देने या नारों तक सीमित नहीं होना चाहिए। वास्तविक सम्मान तब होगा जब उनकी समस्याओं का समाधान समयबद्ध, पारदर्शी और संवेदनशील तरीके से हो। शासन-प्रशासन के प्रत्येक स्तर पर सैनिकों और पूर्व सैनिकों से जुड़े मामलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इसी संदर्भ में राष्ट्रीय सैन्य आयोग के गठन पर गंभीर विचार किया जाना चाहिए। जैसे महिला आयोग, बाल अधिकार संरक्षण आयोग और मानवाधिकार आयोग विभिन्न वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए कार्य करते हैं, वैसे ही सैनिकों, पूर्व सैनिकों और उनके आश्रितों के लिए भी एक स्वतंत्र एवं प्रभावी संस्थागत व्यवस्था विकसित की जा सकती है। ऐसा आयोग पेंशन, भूमि विवाद, पुनर्वास, स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासनिक शिकायतों के त्वरित समाधान का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
यह किसी राजनीतिक दल या सरकार का विषय नहीं है। यह राष्ट्र की सामूहिक जिम्मेदारी का प्रश्न है। सैनिक किसी विचारधारा का नहीं, बल्कि पूरे भारत का होता है। इसलिए उसकी गरिमा, सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा भी राष्ट्रीय सहमति का विषय होनी चाहिए।
आज आवश्यकता केवल सैनिकों के शौर्य का गुणगान करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करने की है जिसमें उन्हें अपने ही देश में न्याय के लिए संघर्ष न करना पड़े।
एक मजबूत सेना का आधार केवल आधुनिक हथियार नहीं, बल्कि निश्चिंत सैनिक होता है।
यदि हम चाहते हैं कि भारत की सीमाएँ अभेद्य रहें, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सीमा पर खड़ा जवान अपने घर-परिवार और अधिकारों की चिंता से मुक्त रहे। सैनिक को केवल एक ही लड़ाई लड़नी चाहिए—राष्ट्र की रक्षा की लड़ाई।
उसे अपने ही देश की व्यवस्था से दूसरी लड़ाई लड़ने के लिए विवश करना न तो न्यायसंगत है और न ही राष्ट्रहित में।
सैनिक का सम्मान केवल शब्दों में नहीं, व्यवस्था में दिखाई देना चाहिए। यही सच्ची राष्ट्रभक्ति है, यही एक सशक्त भारत की पहचान है।
जय हिंद! 🇮🇳
सैनिकों को दो लड़ाइयाँ लड़ने के लिए मजबूर न करें
सीमा पर शत्रु से संघर्ष करने वाले जवान को व्यवस्था से नहीं, सम्मान से मिलना चाहिए
✍️ महेंद्र पाल सिंह रावत
पूर्व सैनिक, गढ़वाल राइफल्स
अध्यक्ष, पूर्व सैनिक संघर्ष समिति, कोटद्वार
किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा केवल उसकी सीमाओं पर तैनात सैनिकों के साहस से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से भी सुनिश्चित होती है जो उन सैनिकों के सम्मान, अधिकारों और कल्याण की रक्षा करती है। भारत का सैनिक अपने प्राणों की परवाह किए बिना सीमाओं की रक्षा करता है। वह अपना परिवार, व्यक्तिगत सुख और जीवन की अनेक सुविधाएँ त्यागकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखता है। इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि राष्ट्र भी उसके अधिकारों और सम्मान की रक्षा उसी गंभीरता से करे।
दुर्भाग्य से अनेक सैनिकों और पूर्व सैनिकों का अनुभव इससे भिन्न दिखाई देता है। सीमाओं से अवकाश लेकर घर लौटने वाला सैनिक अनेक बार अपने परिवार के साथ समय बिताने के बजाय तहसील, न्यायालय, राजस्व कार्यालय और अन्य सरकारी विभागों के चक्कर लगाने को विवश हो जाता है। भूमि विवाद, पेंशन, सेवा लाभ, प्रशासनिक प्रक्रियाएँ और न्यायिक विलंब उसके बहुमूल्य अवकाश को निगल लेते हैं।
यह केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं है; यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय भी है। जिस सैनिक का मन अपने परिवार की समस्याओं और लंबित मामलों में उलझा रहेगा, उससे पूर्ण मानसिक एकाग्रता और सर्वोच्च प्रदर्शन की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा। सैनिक का मनोबल केवल हथियारों से नहीं, बल्कि इस विश्वास से मजबूत होता है कि उसका राष्ट्र उसके साथ न्याय करेगा।
सेवानिवृत्ति के बाद स्थिति कई बार और अधिक कठिन हो जाती है। जिन लोगों ने अपने जीवन के दो से तीन दशक राष्ट्र की सेवा में समर्पित किए, वे अपने ही अधिकारों के लिए वर्षों तक सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने को विवश हो जाते हैं। यह स्थिति केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि हमारे संवेदनशील लोकतंत्र के लिए भी आत्ममंथन का विषय है।
सैनिकों का सम्मान केवल राष्ट्रीय पर्वों पर पुष्पांजलि अर्पित करने, भाषण देने या नारों तक सीमित नहीं होना चाहिए। वास्तविक सम्मान तब होगा जब उनकी समस्याओं का समाधान समयबद्ध, पारदर्शी और संवेदनशील तरीके से हो। शासन-प्रशासन के प्रत्येक स्तर पर सैनिकों और पूर्व सैनिकों से जुड़े मामलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इसी संदर्भ में राष्ट्रीय सैन्य आयोग के गठन पर गंभीर विचार किया जाना चाहिए। जैसे महिला आयोग, बाल अधिकार संरक्षण आयोग और मानवाधिकार आयोग विभिन्न वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए कार्य करते हैं, वैसे ही सैनिकों, पूर्व सैनिकों और उनके आश्रितों के लिए भी एक स्वतंत्र एवं प्रभावी संस्थागत व्यवस्था विकसित की जा सकती है। ऐसा आयोग पेंशन, भूमि विवाद, पुनर्वास, स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासनिक शिकायतों के त्वरित समाधान का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
यह किसी राजनीतिक दल या सरकार का विषय नहीं है। यह राष्ट्र की सामूहिक जिम्मेदारी का प्रश्न है। सैनिक किसी विचारधारा का नहीं, बल्कि पूरे भारत का होता है। इसलिए उसकी गरिमा, सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा भी राष्ट्रीय सहमति का विषय होनी चाहिए।
आज आवश्यकता केवल सैनिकों के शौर्य का गुणगान करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करने की है जिसमें उन्हें अपने ही देश में न्याय के लिए संघर्ष न करना पड़े।
एक मजबूत सेना का आधार केवल आधुनिक हथियार नहीं, बल्कि निश्चिंत सैनिक होता है।
यदि हम चाहते हैं कि भारत की सीमाएँ अभेद्य रहें, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सीमा पर खड़ा जवान अपने घर-परिवार और अधिकारों की चिंता से मुक्त रहे। सैनिक को केवल एक ही लड़ाई लड़नी चाहिए—राष्ट्र की रक्षा की लड़ाई।
उसे अपने ही देश की व्यवस्था से दूसरी लड़ाई लड़ने के लिए विवश करना न तो न्यायसंगत है और न ही राष्ट्रहित में।
सैनिक का सम्मान केवल शब्दों में नहीं, व्यवस्था में दिखाई देना चाहिए। यही सच्ची राष्ट्रभक्ति है, यही एक सशक्त भारत की पहचान है।
