गढ़वाली लोक संस्कृति के दो महान ध्वजवाहक स्व: जीत सिंह नेगी और चन्द्र सिंह राही: लोक संस्कृति जिनके लिए आराधना थी व्यावसाय नही वे गढ़वाल की माटी का ऋण चुका रहे थे अपनी संस्कृति को भारत ही नही दुनिया भर में रेडियो आडियो कैसिट के माध्यम से दोनों ने अपनी कला को व्यापार नही बनाया बल्कि आराधना की पहले बात करें गढ़वाल की गीत संस्कृति के भीष्म पितामह स्व: जीत सिंह नेगी जी की आज से पैंतीस चालीस साल पहले आकाशवाणी के लखनऊ केन्द्र से प्रसारित उत्तरायण, तथा नजीबाबाद केन्द्र से प्रसारित गिरिगुंजन कार्यक्रम, शैलसंगीत कार्यक्रम में स्व: जीत सिंह नेगी जी के लोक नाटक जीतू बगड्डवाल, मलेथा की गूल तथा लोक गीत हे दर्जी दिदा, तू होली ऊंची डांड्यूं मा बीरा घसियारी का वेष मां, काली रात ब्योण जैंसे कालजयी गीत सुनाई देते थे स्वर्गीय जीत सिंह नेगी जी की आवाज तो देवीय आवाज थी जो अंतरआत्मा तक को छू जाती थी बेहद सरल स्वभाव के जीत सिंह नेगी जी को कोटि कोटि नमन वहीं बात करें स्वर्गीय चन्द्र सिंह राही जी की तो पहाड़ का यह लाल बना ही गढ़वाल की लोक संस्कृति के लिए था, गढ़वाल की लोक कला गीत, संगीत, ढोल सागर, जागर, लोक वाद्ययंत्र और उनकी उत्पत्ति महत्ता पर जितना शोध और ज्ञान स्वर्गीय राही जी को था वह अतुलनीय है, जागर जोकि गढ़वाल की संस्कृति के महत्वपूर्ण भाग हैं में उनका ज्ञान अद्वितीय था, और उनके द्वारा गाये गये गीत जिनमें स्वर्गतारा जुन्यली रात, रुमझुम रुमझुम बरखा च, पार भीड़ा कोच भागी, जरा ठंडू चला दी जरा मठू जला दी, चैता, सौली, भाना, ढांगा रै, जैंसे सैकड़ों मधुर गीत लिखे तथा गाये, एक बार मालवीय उद्यान में मेरी स्वर्गीय राही जी से मुलाकात हुई एक स्मरण उन्होंने बताया कि एक गीत मी बीमार छोंऊ नगीना ली जा दी नगीना हास्पिटल मां एक्सरा(एक्सरे) करा दी, तो वह गीत अनजाने ही सही गोविन्द नगर कोटद्वार स्थित डाक्टर अनिल कुमार विज के नगीना नर्सिंग होम का जबरदस्त प्रचार करा गया तथा समूचे गढ़वाल से लोग डॉ विज के नगीना नर्सिंग होम में पंहुचने लगे, इससे प्रभावित होकर डॉक्टर विज ने तब पांच हजार रुपये स्वैच्छिक रूप से स्वर्गीय राही जी को दिए, अपने जीवन काल में गढ़वाल की इन दो विभूतियों ने कला को पूजा माना, कैसेट सीडी तथा स्टेज शो के नाम पर लाखों नही मांगे बस लोगों की तालियां ही इनकी कमाई थी उत्तराखण्ड सरकार को इन दोनों लोक संस्कृति के महान ध्वजवाहकों की स्मृति में लोक संस्कृति पुरुष्कार प्रारंभ करने चाहिए भारतखंडे संगीत विश्वविद्यालय में इनकी रचनाओं पर शोध होने चाहिए। अजय तिवाड़ी।
*गढ़वाली लोक संस्कृति के दो महान ध्वजवाहक स्व: जीत सिंह नेगी और स्व: चन्द्र सिंह राही*
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