उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ता गुलदार का आतंक: कब मिलेगा स्थायी समाधान? अजय तिवाड़ी

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उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ता गुलदार का आतंक: कब मिलेगा स्थायी समाधान? अजय तिवाड़ी

देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में गुलदार के हमलों की घटनाएं लगातार चिंता का विषय बनी हुई हैं। लगभग हर महीने किसी न किसी क्षेत्र से गुलदार द्वारा मानव पर हमले या मानव भक्षण की खबरें सामने आ रही हैं। इन घटनाओं ने ग्रामीणों में भय का माहौल पैदा कर दिया है और कई परिवार अपने दैनिक जीवन में असुरक्षा महसूस कर रहे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्तमान में सरकार की ओर से हमलों के बाद आदमखोर घोषित गुलदार को मारने और मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता देने तक ही कार्रवाई सीमित दिखाई देती है। उनका मानना है कि इस गंभीर समस्या के स्थायी समाधान के लिए दीर्घकालिक और वैज्ञानिक रणनीति की आवश्यकता है।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि वन्य क्षेत्रों के आसपास गुलदार के प्राकृतिक शिकार, जैसे हिरन और अन्य वन्य जीवों की संख्या में कमी आने से गुलदार भोजन की तलाश में मानव बस्तियों की ओर रुख कर रहा है। इसके कारण खेतों, जंगलों और गांवों के रास्तों पर लोगों के लिए खतरा लगातार बढ़ रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना, संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाना, त्वरित चेतावनी प्रणाली विकसित करना तथा प्रभावित गांवों में प्रभावी सुरक्षा उपाय लागू करना आवश्यक है।

पर्वतीय क्षेत्रों के कई लोग यह भी मानते हैं कि लगातार बढ़ रहे गुलदार के हमले पलायन के कारणों में भी शामिल हो रहे हैं। उनका कहना है कि यदि ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई तो पहाड़ों की आबादी, संस्कृति और विरासत पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

स्थानीय लोगों ने सरकार से मांग की है कि मानव जीवन की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलित नीति बनाई जाए। साथ ही वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों में वन्यजीवों के लिए पर्याप्त प्राकृतिक भोजन और बेहतर आवास प्रबंधन सुनिश्चित किया जाए, ताकि मानव-वन्यजीव संघर्ष को प्रभावी रूप से कम किया जा सके।अजय तिवाड़ी

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