श्री कृष्ण जन्माष्टमी : धर्म, प्रेम और मानवता का महापर्व
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”
— श्रीमद्भगवद्गीता
जब-जब इस धरा पर अंधकार गहराया है और अधर्म ने धर्म को चुनौती दी है, तब-तब उस निराकार परम चेतना ने साकार रूप में अवतार लिया है। समस्त अवतारों में यदि कोई अवतार सबसे अधिक सम्पूर्ण, मानवीय और लीलामय है, तो वह है लीला-पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण का अवतार। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल एक तिथि नहीं, एक चेतना है।
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि में चंद्रमा के उच्चस्थ होने पर, निशीथ काल (मध्यरात्रि) में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। इसी पावन बेला को हम जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं।
पौराणिक कथा – बंदीगृह में जन्मा ब्रह्माण्ड का प्रकाश
कथा मथुरा के अत्याचारी राजा कंस से प्रारंभ होती है। आकाशवाणी हुई थी – “हे कंस! देवकी का आठवाँ गर्भ तेरी मृत्यु का कारण बनेगा।” भयभीत कंस ने देवकी-वसुदेव को कारागार में डाल दिया।
शास्त्रों (श्रीमद्भागवत ) के अनुसार, कंस ने देवकी के प्रथम छह पुत्रों का वध कर दिया। सातवां गर्भ स्वयं शेषनाग के अवतार बलराम जी का था, जिन्हें योगमाया ने आकर्षित करके रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया, इसलिए वे संकर्षण कहलाए।
भादों की घनघोर अंधेरी रात, मूसलाधार वर्षा में अष्टमी की मध्यरात्रि को कारागार में अलौकिक प्रकाश फैला। भगवान विष्णु ने शंख, चक्र, गदा, पद्म के साथ चतुर्भुज रूप में दर्शन दिए और फिर नन्हे, कमल-नयन बालक के रूप में परिवर्तित हो गए।
प्रभु की माया से कारागार के ताले स्वतः खुल गए, पहरेदार निद्रा में लीन हो गए। वसुदेव जी ने बालक को टोकरी में रखा और यमुना पार गोकुल की ओर चल पड़े। उफान पर आई यमुना ने प्रभु के चरण स्पर्श हेतु मार्ग दे दिया और शेषनाग ने अपने फनों से वर्षा से रक्षा की। गोकुल में उसी रात यशोदा ने आदिशक्ति योगमाया के रूप में एक कन्या को जन्म दिया था। वसुदेव ने बालक को यशोदा के पास सुलाकर कन्या को मथुरा ले आए। जब कंस ने कन्या को मारना चाहा, तो वह आकाश में स्थित होकर बोलीं – “रे मूर्ख! तुझे मारने वाला तो गोकुल में सुरक्षित है।”
एक व्यक्तित्व में अनेक रूप
1. वात्सल्यमय बालक – नंद-यशोदा के आंगन में माखन चुराने वाला और मिट्टी खाने पर मुख में ब्रह्माण्ड दिखाने वाला।
2. प्रेम का शिखर – रास-बिहारी के रूप में उनकी मुरली जीवात्मा को परमात्मा से जोड़ती है। रास में प्रत्येक गोपी को लगता है कि कृष्ण केवल उसी के साथ हैं – यही ईश्वर की व्यक्तिगत व्यापकता है।
3. योगेश्वर और नीतिज्ञ – कुरुक्षेत्र में मोहग्रस्त अर्जुन को दिया गया गीता-ज्ञान – “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” – केवल युद्ध का नहीं, सम्पूर्ण जीवन जीने का दर्शन है।
साहित्य और संस्कृति में
हिन्दी साहित्य श्रीकृष्ण के बिना अधूरा है। सूरदास ने वात्सल्य, मीरा ने माधुर्य, रसखान ने अनन्य भक्ति के रूप में उन्हें देखा। ब्रज की होली, वृंदावन का फूल बंगला, महाराष्ट्र की दही-हांडी – यह सब उसी माखन-चोरी लीला के सामूहिक उत्सव हैं।
आज जब समाज में कंस रूपी अहंकार बढ़ रहा है, तब कृष्ण का बाल रूप हमें सिखाता है कि प्रेम और सादगी से बड़े से बड़े अहंकार को जीता जा सकता है।
“नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की।
हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की॥”
अंततः यह पर्व हमारे भीतर सोए हुए सत्य, प्रेम और धर्म के पुनर्जागरण का पर्व है।
आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं! जय श्री कृष्ण!
नोट- यह आलेख श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध), श्रीमद्भगवद्गीता एवं अन्य प्रामाणिक संदर्भों पर आधारित है।
संग्रह एवं प्रस्तुति-
राजीव थपलियाल (प्रधानाध्यापक)
राजकीय प्राथमिक विद्यालय मेरुड़ा, जयहरीखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड
