*रक्षाबंधन : स्नेह, समर्पण एवं संस्कृति का महापर्व: ख्यातिप्राप्त प्रधानाध्यापक राजीव थपलियाल*

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“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:”

रक्षाबंधन : स्नेह, समर्पण एवं संस्कृति का महापर्व

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:”

भारतवर्ष त्योहारों का देश है। यहाँ प्रत्येक पर्व जीवन को एक नया दर्शन देता है। रक्षाबंधन उनमें सर्वाधिक मधुर एवं पवित्र पर्व है। यह भ्रातृ-भगिनी के अटूट स्नेह, विश्वास एवं संरक्षण का प्रतीक है। “स्नेहस्य बंधनम्, समर्पणस्य प्रमाणम्” – यही इस पर्व का सार है।

भारत के साथ-साथ नेपाल, मॉरीशस, फिजी आदि देशों में भी यह उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व हमें “वसुधैव कुटुंबकम्” का संदेश देता है।

1. शास्त्रीय एवं धार्मिक आधार
हिंदू पंचांगानुसार श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन ब्राह्मण नवीन यज्ञोपवीत धारण कर “उपाकर्म” संस्कार करते हैं।

संस्कृत श्लोक:

“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
अर्थ: जिस रक्षा सूत्र से महाबली दानवराज बली को बांधा गया, उसी से मैं तुम्हें बांधती हूँ। हे रक्षे! तुम अडिग रहना।

2. ऐतिहासिक एवं पौराणिक गौरव

  1. भगवान कृष्ण एवं द्रौपदी: द्रौपदी द्वारा साड़ी के पल्लू से बंधी राखी की लाज भगवान कृष्ण ने महाभारत में चीर बढ़ाकर रखी।
  2. महारानी कर्णावती एवं हुमायूं: संकट के समय भेजी गई राखी ने शत्रु को भी भाई बना दिया।
  3. देवराज इंद्र एवं शचि: असुरों पर विजय हेतु देवी शचि द्वारा बांधा गया रक्षासूत्र।

3. महापुरुषों के अमर विचार

“भाई-बहन का रिश्ता त्याग और प्रेम की आधारशिला है।”
महात्मा गांधी

“रक्षा करना सशक्त का धर्म है।”
स्वामी विवेकानंद

“बहन ईश्वर का वह उपहार है जो हमें मित्र और रक्षक दोनों रूपों में प्राप्त होती है।”
रवीन्द्रनाथ ठाकुर

4. भारत की विविध लोक परंपराएँ
भारत की विशेषता उसकी विविधता में एकता है। प्रत्येक प्रांत में रक्षाबंधन का स्वरूप भिन्न है:

  • राजस्थान: ‘लूंबी राखी’ की अनूठी परंपरा
  • महाराष्ट्र: ‘नारळी पूर्णिमा’ के रूप में समुद्र पूजन
  • पश्चिम बंगाल: ‘झुलन पूर्णिमा’ के साथ भगवान कृष्ण का उत्सव
  • देवभूमि उत्तराखंड: इसे ‘घी-संक्रांति’ भी कहा जाता है। यहाँ बहनें भाइयों को ‘भिटौली’ भेजती हैं और ‘ज्वारे’ बांधकर सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

5. समकालीन प्रासंगिकता
आज यह पर्व पारिवारिक सीमाओं से परे जा चुका है। बहनें देश के सैनिकों को, शिष्य गुरु को और नागरिक समाजसेवियों को राखी बांधते हैं। यह हमें प्रकृति, समाज और राष्ट्र की रक्षा का भी संकल्प देता है।

“रिश्ते खून के नहीं होते, रिश्ते एहसास के होते हैं। राखी के धागे कमजोर सही, पर बंधन आकाश के होते हैं।”

उपसंहार
रक्षाबंधन हमें सिखाता है – “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्”। आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी परस्पर प्रेम, सहयोग एवं सद्भाव का व्रत लें। तभी इस महापर्व की सार्थकता सिद्ध होगी और हमारी सांस्कृतिक विरासत चिरकाल तक अक्षुण्ण रहेगी।

“एक धागा, अनेक भाव, अनंत आशीर्वाद – यही है रक्षाबंधन”

संग्रह एवं प्रस्तुति
राजीव थपलियाल, प्रधानाध्यापक
राजकीय प्राथमिक विद्यालय मेरूड़ा, जयहरीखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड

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