आलेख :
महेंद्र पाल सिंह रावत (पूर्व सैनिक) कोटद्वार
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महेंद्र पाल सिंह रावत (पूर्व सैनिक) कोटद्वार
“अगस्त क्रांति या तिरंगा यात्रा: शहादत पर सियासत न हो”
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महेंद्र पाल सिंह रावत (पूर्व सैनिक) कोटद्वार
आज 9 अगस्त है। आज ही के दिन 1942 में मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान से बापू ने "करो या मरो" का उद्घोष किया था और *अगस्त क्रांति* यानी 'भारत छोड़ो आंदोलन' की शुरुआत हुई थी। उसी आग में तपकर हमें आजादी मिली।
आज एक तरफ *अगस्त क्रांति* की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ *तिरंगा यात्रा* निकाली जा रही है। एक राजनीतिक दल एक रास्ते पर है, दूसरा दूसरे रास्ते पर। प्रश्न उठता है: *क्या हम शहीदों की शहादत को भी "मेरे" और "तेरे" में बांट रहे हैं?*
इतिहास गवाह है: क्रांतियों से ही तिरंगे को बल मिला
भारत में आजादी से पहले विदेशी हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम और किसान-जन आंदोलन हुए। आजादी के बाद देश को भूख से बचाने के लिए *हरित क्रांति* हुई, दूध की नदियां बहाने के लिए *श्वेत क्रांति* हुई। इन सभी क्रांतियों का एक ही मकसद था - *देश को मजबूत करना, तिरंगे को ऊंचा करना।*
हमारा तिरंगा कोई कपड़े का टुकड़ा नहीं है।
केसरिया – साहस और त्याग का प्रतीक
सफेद – शांति और सत्य का प्रतीक
हरा – समृद्धि और विकास का प्रतीक
अशोक चक्र – धर्म के मार्ग पर निरंतर प्रगति का प्रतीक
इस तिरंगे के लिए भगत सिंह फांसी चढ़े, चंद्रशेखर आजाद शहीद हुए, कारगिल में हमारे जवानों ने सरहद पर खून बहाया। *क्या उनकी शहादत किसी एक दल की धरोहर है? नहीं।* शहादत का कोई रंग, कोई पार्टी नहीं होती।
*असली सवाल: हम किस रास्ते पर हैं?– तिरंगा यात्रा निकालना अच्छी बात है। लेकिन उससे पहले हमें खुद से पूछना होगा – *क्या हम उसी रास्ते पर चल रहे हैं जो तिरंगे ने हमें दिखाया है?*– क्या हम साहस और त्याग का केसरिया अपना रहे हैं?
क्या हम शांति और सत्य की सफेद पट्टी को बचा पा रहे हैं?
क्या हम विकास और समृद्धि का हरा रंग गांव-गांव तक पहुंचा पा रहे हैं?
क्या हम धर्म और प्रगति के नीले चक्र पर चल रहे हैं?
भारत का नागरिक जो भी काम मां भारती को मजबूत और संगठित करता है, वही सच्ची तिरंगा यात्रा है। सिर्फ हाथ में झंडा लेकर चल देना यात्रा नहीं है। खेत में पसीना बहाना यात्रा है, सीमा पर पहरा देना यात्रा है, स्कूल में बच्चों को संस्कार देना यात्रा है।
चिंता का विषय– पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि राष्ट्र और राष्ट्रीयता की परिभाषा भी बदल दी गई है। जो एक दल के लिए वरदान है, वही दूसरे के लिए अभिशाप बन जाता है। देशभक्ति को भी तराजू पर तोला जाने लगा है। लेकिन इतिहास हमें याद दिलाता है – देश क्रांतियों से बना है, नारों से नहीं। 1942 की अगस्त क्रांति ने अंग्रेजों को हिला दिया था क्योंकि उसमें एकजुटता थी। आज हमें भी उसी एकजुटता की जरूरत है।
निष्कर्ष– तिरंगा हर भारतीय के माथे का मुकुट है। इसे किसी यात्रा, किसी रैली या किसी भाषण तक सीमित मत कीजिए।
मेरा भारत महान था, महान है, और महान रहेगा -लेकिन तब जब हम शहीदों के सपनों को राजनीति की भेंट न चढ़ाएं।
आइए, आज अगस्त क्रांति के दिन प्रण लें कि हम तिरंगे के तीन रंगों और एक चक्र पर चलकर ही देश को आगे बढ़ाएंगे। *यही शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।*
जय हिन्द, जय भारत, वंदे मातरम्
