एक बार भगवान शिव द्वारा परिहास में ‘काली’ कहे जाने पर माता पार्वती को गहरा दुख हुआ। अपने गोरा वर्ण (रंग) को पुनः प्राप्त करने के लिए वे कठोर तपस्या करने वन में चली गईं।
इसी दौरान एक भूखा शेर माता को अपना आहार बनाने की इच्छा से वहां आया। परंतु माता के तप के तेज के कारण वह उनके समीप नहीं जा सका। माता को खाने की प्रतीक्षा में वह शेर भी वर्षों तक वहीं बैठा रहा। अनजाने में ही सही, लेकिन उस शेर ने भी माता के साथ वर्षों तक भूखा-प्यासा रहकर कठिन तप किया।
जब भगवान शिव ने प्रकट होकर माता को ‘गौरी’ होने का वरदान दिया, तब माता ने उस शेर के धैर्य और अनजाने में किए गए तप को पहचाना। उन्होंने भगवान शिव से निवेदन किया कि इस शेर ने भी मेरे साथ समान तपस्या की है, इसलिए इसे भी वरदान मिलना चाहिए। माता की करुणा के फलस्वरूप भगवान शिव ने उस सिंह को मां गौरी का वाहन बना दिया। इस प्रकार वह सिंह धन्य हुआ और माता ‘मां शेरावाली’ कहलाईं।
