उत्तराखंड के वनों पर आग का कहर, समाधान में स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी – ऋषि कण्डवाल (लेखक उत्तराखण्ड सरकार में सिंचाई राज्य मंत्री हैं)

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उत्तराखंड के वनों पर आग का कहर, समाधान में स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी

ऋषि कण्डवाल( लेखक उत्तराखण्ड सरकार में सिंचाई राज्य मंत्री हैं)

कोटद्वार/देहरादून। उत्तराखंड के हिमालयी एवं शिवालिक क्षेत्र में बढ़ती वनाग्नि की घटनाएं राज्य की वन सम्पदा और वन्यजीवों के लिए गंभीर संकट बनती जा रही हैं। विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि वनों में तेजी से फैल रहा लैंटाना तथा चीड़ (पाइनस) के वृक्षों से गिरने वाला अत्यधिक ज्वलनशील पिरूल वनाग्नि की घटनाओं के प्रमुख कारणों में शामिल है।

हर वर्ष गर्मियों के मौसम में हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र आग की चपेट में आ जाता है, जिससे बहुमूल्य वन सम्पदा, जैव विविधता तथा वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को भारी क्षति पहुंचती है। वनाग्नि के कारण अनेक छोटे जीव-जंतु, पक्षी तथा दुर्लभ वनस्पतियां प्रभावित होती हैं, जबकि कई क्षेत्रों में मिट्टी की उर्वरता और जल स्रोतों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग के पास दावानल की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए पर्याप्त संसाधन, आधुनिक उपकरण और मानवबल उपलब्ध नहीं है। उनका कहना है कि वन क्षेत्र के आसपास रहने वाले ग्रामीणों को वन संरक्षण में सहभागी बनाने के बजाय कई बार वन कानूनों की जटिलताओं के कारण उनके पारंपरिक हक-हकूक और सहभागिता को सीमित कर दिया जाता है, जिससे वन और समुदाय के बीच समन्वय कमजोर होता है।

वन एवं पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि लैंटाना जैसी आक्रामक प्रजातियों के नियंत्रण, पिरूल के वैज्ञानिक प्रबंधन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और आधुनिक अग्निशमन संसाधनों की उपलब्धता के बिना वनाग्नि की समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। उनका सुझाव है कि ग्रामीणों को वन संरक्षण का भागीदार बनाकर तथा पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करके आग की घटनाओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान और लंबे शुष्क मौसम ने भी वनाग्नि की घटनाओं में वृद्धि की है। ऐसे में सरकार, वन विभाग और स्थानीय समुदायों को मिलकर एक समन्वित रणनीति अपनाने की आवश्यकता है, ताकि उत्तराखंड की समृद्ध वन सम्पदा और वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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