नई शिक्षा नीति 2020 -“आलेख शिक्षाविद् अजयपाल सिंह रावत”

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स्वतन्त्रता के पश्चात्‌ भारतवर्ष में शिक्षा में अमूल-चूल परिवर्तन के लिए अथक प्रयास किए गए न राष्ट्रीय शिक्षा में भी अप्रत्याशित प्रयास किए गये। सन्‌ 1968 व 1986 व अब एक लम्बे 34 साल के समयान्तराल के बाद जुलाई 2020 में ‘नई शिक्षा नीति 2020’ की घोषणा की गई। इस शिक्षा नीति के ड्राफ्ट कमेटी के चेयरमैन ISRO के चीफ डॉ० कृष्णस्वामी कस्तूरीरंजन थे, उन्हीं के दिशा-निर्देशन में नवम्बर 2019 में भारत सरकार को यह ड्राफ्ट सौंपा गया।

इस शिक्षा नीति में कुछ ऐसे अप्रत्याशित बदलाव किए गए जो कि वास्तव में वर्तमान समय की एक बड़ी आवश्यकता थी | सर्वप्रथम 34 साल पुराना ढाँचा 10 + 2 को समाप्त कर एक नया ढाँचा 5+3+3+4 दिया गया, जिसमें प्री-प्राइमरी को एक मूर्त रूप प्रदान किया गया। जहाँ ‘प्री-प्राइमरी’ पब्लिक स्कूलों में मात्र खानापूर्ति के रूप में प्ले ग्रुप या किन्डर गार्डन व सरकार के द्वारा पब्लिक स्कूलों के प्ले ग्रुप का वैकल्पिक रूप ‘आँगनबाड़ी’ के रूप में चल रहा है, जो कि अस्तित्व में था लेकिन शिक्षा का मूल अंग नहीं था।

अब उसे शिक्षा के मुख्य व मूल अंग के रूप में अस्तित्व में लाया गया है और जो अब नर्सरी, एल०के०जी०, यू०के०जी० व कक्षा 01 व 02 (03 से 08 वर्ष) के बच्चे अर्थात्‌ 05 वर्षीय फाउन्डेशनल स्टेज का [ रूप ले चुका है। दूसरा कक्षा 03 से 05 (08 से 11 वर्ष) के बच्चों का जिसे प्रिपरेटरी स्टेज, कक्षा 06 से 08 (11 से 14 वर्ष) के बच्चों के लिए मिडिल स्टेज और 09 से 12 (14 से 18 वर्ष) के बच्चों के लिए सैकेण्डरी स्टेज के नये ढाँचें को मूर्त रूप दिया गया है।
इस नीति का एक वैज्ञानिक सोच से प्री-प्राइमरी को जहाँ शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ा गया हैं, वहीं उनका मानसिक विकास की अवधारणा का भी पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है।

जहाँ पुराने ढाँचें में कक्षा 01 से (06 वर्ष) बच्चों को स्कूलों में प्रवेश करने का प्रावधान था और उसके पीछे एक मनोवैज्ञानिक सोच थी कि 06 वर्ष तक के उम्र के बच्चों का मानसिक विकास द्रुतगति से होता है और उनमें अपने आस-पास की वस्तुओं को समझने की सोच विकसित हो जाती है, अर्थात्‌ स्कूलों के बस्ता का बोझ उन पर न पड़े ताकि उनका पूर्ण मानसिक विकास, स्वतंत्र रूप से हो सकें, जबकि पब्लिक स्कूलों के द्वारा उन बाल मन पर पूरा बस्ता का बोझ होता था। अब इस नए ढॉँचें में प्री-प्राइमरी (प्रथम 03 वर्ष) केवल खेल-विधि से ही बच्चों का मानसिक विकास किया जाएगा। अर्थात्‌ उनके ऊपर बस्ता का बोझ नही होगा, जो कि एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक सोच को दर्शाता है।

प्रिपरेटरी स्टेज कक्षा 03 से 05 जो फिर फाउन्डेशनल स्टेज की गतिविधि को आगे बढ़ाएगा व धीरे-धीरे बच्चे अपनी पढ़ाई की ओर बढ़ेंगे, जिसमें पढ़ने व लिखने, बोलने, शारीरिक शिक्षा, कला भाषा, विज्ञान और गणित भी शामिल होंगे। मीडिल स्टेज में भी 03 वर्ष की शिक्षा होगी और इसमें विषय विशेषज्ञ शिक्षकों द्वारा विषय की अमूर्त अवधारणाओं पर काम शुरू होगा।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि 10 + 2 वाला सिस्टम खत्म होगा व कक्षा 9 से 12 तक का स्टेज (+ 4) से जाना जायेगा और जिसे सेकेण्डरी (14 से 18 वर्ष) स्टेज कहा गया और इसमें सबसे सुन्दर बात यह है कि छात्रों के लिए विषय की बाध्यता नही होगी। पूर्व की भॉति विज्ञान / कॉमर्स / आर्ट जैसे अलग-अलग विषयों की बाध्यता समाप्त हो जाएगी लेकिन यह विषय की, स्वतंत्रता बच्चों के भविष्य के लिए कितना फलदायी होगी या उन्हें प्रतियोगिता जैसे NEET/IT और सिविल सर्विस के लिए कितना सहायक होगा, यह अभी कहना
जल्दबाजी होगी।

लेकिन इस पर गहन विचार की आवश्यकता है। समावेशी शिक्षा के अन्तर्गत विकलांग छात्रों (Disabled students) का सामान्य बच्चों के साथ प्रवेश का अधिकार देना भी एक बड़ी चुनौती होगी। पहाड़ी प्रदेशों में इसे मूर्त रूप देना असम्भव तो नहीं पर कठिन
जरूर है। पहाड़ी प्रदेशों में विकलांग छात्रों (Disabled students) का रोजाना घर से स्कूल व स्कूल से घर आना-जाना भी काफी चुनौतीपूर्ण होगा |

NEP के अनुसार, यह निश्चित है कि उन बंच्चों को. घर का वातावरण g माता-पिता का प्यार अवश्य मिल जाएगा मगर इस पहलू पर भी सोचना होगा कि क्या उनको उनकी कमजोरियों को ध्यान में रखकर सुविधाजनक ढांचा उनके अनुरूप मिल पाएगा? जो एक विशेष प्रकार का विद्यालय उन बच्चों को ध्यान में रखकर तैयार करता है। इसका दूसरा पहलू पठन-पाठन की सुविधा व विशेष बी0एड0 वाले अध्यापकों (जो विभिन्‍न प्रकार के विकलांग बच्चों की समस्याओं के अनुरूप उस विद्या में दक्ष हो) और जो अध्ययन से आभास हो रहा है इस तरह का फैसला आम विद्यालयों के लिए भी काफी परेशानियों का सबव बन सकता है।

यह तो आने वाले समय में जब यह योजना धरातल पर पूर्ण रूप से उत्तर जाएगी तभी इसका पूर्ण व सटीक आकलन किया जा सकता है। ड्रॉप आउट छात्रों को ढूंढकर 100% प्रवेश सुनिश्चित करना विद्यालयों / अध्यापकों के माध्यम से मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन होगा और जो अध्ययन से उभरकर सामने आ रहा है ऐसा लग रहा है कि यह मात्र एक खानापूर्ति ही होगी |

इससे अच्छा होता कि सरकार एक ऐसी पॉलिसी बनाए जिससे जो भी बच्चा जहाँ भी जाए उसके माता-पिता को उसे विद्यालय में प्रवेश दिलवाना उनकी मजबूरी हो जाए। सरकार उनके बच्चों का एक PEN कार्ड बनाए जिसे दिखाकर ही बच्चे तथा उसके परिवार को सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाएं जैसे-मकान, राशन, बिजली आदि उपलब्ध करवाई जाए। ताकि 100% प्रवेश का सपना धरातल पर कुछ हद तक साकार हो सके |
घन्यवाद्‌!

अजयपाल सिंह रावत (प्रबन्धक)
ज्ञान भारती पब्लिक स्कूल, कोटद्वार
नजी0 रोड़, शिवालिक नगर, कोटद्वार

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