नई दिल्ली/अफ्रीका/दक्षिण अमेरिका। दुनिया एक बार फिर ऐसे वायरसों के खतरे का सामना कर रही है, जिन्होंने वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों को असमंजस में डाल दिया है। हाल ही में सामने आए इबोला और हंटावायरस के नए प्रकोपों ने यह संकेत दिया है कि वायरसों की दुनिया को लेकर मानव की समझ अभी भी अधूरी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन वायरसों के जो स्वरूप इस समय सामने आए हैं, वे दशकों पहले पहचाने गए वायरसों से काफी अलग हैं, जिसके कारण मौजूदा दवाएं और टीके प्रभावी साबित नहीं हो रहे हैं।

क्रूज जहाज पर फैला हंटावायरस, तीन लोगों की मौत
मई 2026 में दक्षिण अमेरिका के निकट संचालित क्रूज जहाज एम.वी. होंडियस पर हंटावायरस का प्रकोप सामने आया। इस संक्रमण से कम से कम 13 लोग प्रभावित हुए, जिनमें से तीन की मृत्यु हो गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता हुआ दिखाई दिया।
आमतौर पर हंटावायरस चूहों और अन्य कृंतक जीवों के मूत्र, लार या मल के संपर्क से फैलता है। मनुष्य संक्रमित जानवरों के सूखे उत्सर्जन के कण सांस के माध्यम से ग्रहण करने पर बीमार पड़ते हैं। लेकिन इस बार वायरस का व्यक्ति-से-व्यक्ति संक्रमण वैज्ञानिकों के लिए चिंता और शोध का विषय बन गया है।
अफ्रीका में इबोला का नया संकट
उधर अफ्रीका में इबोला वायरस का एक नया प्रकोप तेजी से फैल रहा है। अब तक 900 से अधिक संक्रमण और 220 से ज्यादा मौतें दर्ज की जा चुकी हैं। हालांकि पिछले वर्षों में इबोला के खिलाफ प्रभावी टीके और एंटीवायरल दवाएं विकसित की गई थीं, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्तमान प्रकोप में वे बहुत कम प्रभावी साबित हो सकती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार इस बार संक्रमण फैलाने वाला वायरस पारंपरिक “ज़ैरे इबोला” नहीं बल्कि बुंडीबुग्यो वायरस नामक एक अलग प्रजाति है, जिसके विरुद्ध वर्तमान टीके पर्याप्त सुरक्षा नहीं देते।
वायरस एक नाम, लेकिन कई प्रजातियां
वायरोलॉजिस्टों का कहना है कि आम जनता अक्सर इबोला या हंटावायरस को एक ही वायरस समझती है, जबकि वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है।
जैसे सभी स्तनधारी जीव एक जैसे नहीं होते, उसी प्रकार एक ही वायरस समूह में कई अलग-अलग प्रजातियां और स्ट्रेन मौजूद होते हैं। इनमें आनुवंशिक अंतर इतना अधिक हो सकता है कि एक प्रजाति पर प्रभावी दवा दूसरी पर बिल्कुल काम न करे।
अंतरराष्ट्रीय वायरस वर्गीकरण समिति के विशेषज्ञ डॉ. जेन्स कुहन के अनुसार, वर्तमान घटनाएं यह साबित करती हैं कि दुनिया में मौजूद लाखों-करोड़ों वायरसों के बारे में हमारी जानकारी अभी बेहद सीमित है।
इबोला की कहानी: 50 वर्षों में कई रूप
इबोला वायरस का पहला बड़ा प्रकोप 1976 में तत्कालीन ज़ैरे (वर्तमान कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य) में सामने आया था। उसी वर्ष सूडान में भी एक समान लेकिन आनुवंशिक रूप से अलग वायरस मिला।
बाद में वैज्ञानिकों ने इन्हें अलग-अलग प्रजातियों के रूप में वर्गीकृत किया। इसके बाद वर्षों में इबोला परिवार की कई नई प्रजातियां सामने आईं। 2007 में युगांडा के बुंडीबुग्यो जिले में फैले संक्रमण से 149 लोग संक्रमित हुए और 37 की मौत हुई। यही वायरस अब फिर बड़े पैमाने पर लौट आया है।
चिंता की बात यह है कि बुंडीबुग्यो वायरस, ज़ैरे इबोला से लगभग 30 प्रतिशत आनुवंशिक रूप से अलग है। इसी कारण पुराने टीके और दवाएं इसके विरुद्ध अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही हैं।
हंटावायरस में भी सामने आया नया व्यवहार
हंटावायरस की पहचान पहली बार कोरिया की हंतान नदी क्षेत्र में हुई थी। तब से वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में इसके 38 से अधिक प्रकार खोजे हैं।
हालिया प्रकोप के लिए जिम्मेदार वायरस एंडीज वायरस नामक एक विशेष स्ट्रेन है। यह दक्षिण अमेरिका के कुछ कृंतक जीवों में पाया जाता है। अन्य हंटावायरसों के विपरीत एंडीज वायरस सीधे इंसानों के बीच फैलने की क्षमता रखता है।
वैज्ञानिक अभी तक यह पता नहीं लगा पाए हैं कि कौन-से आनुवंशिक परिवर्तन इसे यह विशेष क्षमता प्रदान करते हैं। इसी कारण अर्जेंटीना और चिली में व्यापक स्तर पर वायरस नमूनों की दोबारा जांच शुरू की जा रही है।
वैज्ञानिकों के सामने नई चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के जंगलों में ऐसे कई वायरस मौजूद हो सकते हैं जिनकी अभी तक पहचान नहीं हुई है। कुछ वायरस केवल एक-दो मामलों में सामने आए हैं, लेकिन भविष्य में वे बड़े प्रकोप का कारण बन सकते हैं।
डॉ. कुहन के अनुसार केवल “इबोला” या “हंटावायरस” जैसे सामान्य नामों का उपयोग कई बार भ्रम पैदा करता है। जब लोग सुनते हैं कि इबोला फैला है, तो उन्हें लगता है कि उसके लिए पहले से इलाज उपलब्ध होगा। लेकिन यदि वायरस की प्रजाति अलग है, तो यह धारणा गलत साबित हो सकती है।
वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए चेतावनी
विशेषज्ञों का कहना है कि हालिया घटनाएं दुनिया के लिए एक स्पष्ट चेतावनी हैं। वायरस लगातार विकसित हो रहे हैं और नए स्वरूप धारण कर रहे हैं। ऐसे में केवल पुराने अनुभवों के आधार पर महामारी से लड़ना पर्याप्त नहीं होगा।
वायरसों की सही पहचान, उनकी आनुवंशिक संरचना का अध्ययन और नए टीकों तथा उपचारों का विकास आने वाले वर्षों में वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा की सबसे बड़ी प्राथमिकता बनने जा रहा है।
निष्कर्ष
इबोला और हंटावायरस के हालिया प्रकोप यह दर्शाते हैं कि मानवता अभी भी वायरसों की विशाल और रहस्यमयी दुनिया को पूरी तरह नहीं समझ पाई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में और भी नए वायरस या उनके नए रूप सामने आ सकते हैं। ऐसे में वैश्विक निगरानी, वैज्ञानिक अनुसंधान और त्वरित स्वास्थ्य प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है।
