पहाड़ की बोडीयां – जीवंत गाथा: महेंद्र पाल सिंह रावत, लेखक पूर्व सैनिक संघर्ष समिति के अध्यक्ष हैं।

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“पहाड़ की बोडीयां – जीवंत गाथा: लेखक पूर्व सैनिक संघर्ष समिति के अध्यक्ष हैं।

आलेख: महेंद्र, पूर्व सैनिक, कोटद्वार

  ये तस्वीर सीधे उत्तराखंड के गांव *डुमैला मल्ला* के आंगन की है। शाम के समय गांव की बुजुर्ग महिलाएं एक साथ बैठ कर आज और अतीत की स्मृतियों को स्मरण कर रही हैं।

 एक पुराना पहाड़ी *डडियाली*, पत्थरों का चबूतरा, चारों तरफ हरियाली।  

और उस चबूतरे पर बैठी हैं पहाड़ की दादी, काकी, चची

 रंग-बिरंगे पहनावे - हरे, नीले, गुलाबी, बैंगनी। सिर पर रंगीन *पग़ुड़ू*। हाथ में लकड़ी का *सोटा* और बीच में टोकरी।  

चेहरे पर थकान नहीं, सुकून और अपनापन है। ये वो महिलाएं हैं जिन्होंने पहाड़ों को मथा है। जिनके तापों बल यानी परिश्रम से आज भी पहाड़ हरे-भरे हैं।

  ये पहाड़ की *बोडीयां* हैं। इनके पास प्रकृति के साथ समन्वय बनाकर जीने का अपार अनुभव है।

 आज *हरेला* के उपलक्ष्य में ये अपने *थाडू* में एक दूसरे के साथ अनुभव साझा कर रही हैं। इनके चेहरे की झुर्रियां चीख-चीख कर कह रही हैं - "हमने पहाड़ों को जिया है, पहाड़ों को जीता है।"

 ये पहाड़ की जीवंत गाथा का बखान कर रही हैं। इन्होंने उत्तराखंड के पहाड़ी परिधानों को वैश्विक जगत में पहुंचाकर हमारे रीति-रिवाजों को नई पहचान दी है।

 यही है पहाड़ी महिला की ताकत:  

एकता – अकेले सब करती हैं, साथ बैठते ही थकान भूल जाती हैं।
धैर्य – बिना शिकायत घर-समाज दोनों संभालती हैं।
संस्कृति की रक्षक – भाषा, पहनावा, रीति को जिंदा रखती हैं।

 जैसा मैंने पहले लिखा था - "हर सफल सैनिक के पीछे एक पहाड़ी महिला शक्ति होती है"। ये तस्वीर उसी शक्ति का प्रमाण है। बिना वर्दी के, पर हौसले में किसी से कम नहीं।

शाम ढलते ही ये बुजुर्ग *थडीया गीत* छेड़ देती हैं:  

बैठ जा रजनी छूवी लगोला अब कखी न जा।
छापन्यली डाल्यो का छएल रजनी बैठी जा”

(अर्थ: “बेटी शाम हो गई, अब कहीं मत जा। छायादार पेड़ के नीचे बैठ जा।)”

“पहाड़ की बोडी, घर की शान – संस्कृति की पहचान”

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