तुर्की–पाकिस्तान समीकरणों के बीच भारत ने चुनी नई रणनीतिक राह
*भारत–साइप्रस रक्षा सहयोग को नई रणनीतिक दिशा, क्षेत्रीय समीकरणों पर पड़ सकता है व्यापक प्रभाव: ऋषि कण्डवाल ( लेखक उत्तराखण्ड सरकार में सिंचाई राज्य मंत्री हैं)*
देहरादून। वैश्विक भू-राजनीति के बदलते परिदृश्य में भारत और साइप्रस के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक चर्चाओं का महत्वपूर्ण विषय बनता जा रहा है। उत्तराखण्ड सरकार में सिंचाई राज्य मंत्री एवं राजनीतिक विश्लेषक के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए लेखक ने कहा कि भारत और साइप्रस के बीच विकसित हो रहा रक्षा सहयोग केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव भूमध्यसागरीय क्षेत्र से लेकर दक्षिण एशिया तक महसूस किया जा सकता है।
लेखक के अनुसार, भारत लंबे समय से अपनी विदेश नीति में रणनीतिक साझेदारियों को मजबूत करने की दिशा में कार्य कर रहा है। ऐसे समय में साइप्रस के साथ रक्षा एवं सुरक्षा क्षेत्र में बढ़ता सहयोग भारत को यूरोप और पूर्वी भूमध्यसागर क्षेत्र में नई सामरिक संभावनाएं प्रदान कर सकता है। उनका मानना है कि यह सहयोग उन देशों के लिए भी एक संदेश है जो लगातार भारत के हितों के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय रहते हैं।
लेखक ने अपने विचारों में तुर्की की नीतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि तुर्की ने अनेक अवसरों पर पाकिस्तान का समर्थन किया है और कश्मीर से जुड़े मुद्दों पर भारत की आपत्तियों के बावजूद अपने विचार व्यक्त किए हैं। उनके अनुसार, भारत को ऐसे देशों के प्रति केवल कूटनीतिक प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से अपने राष्ट्रीय हितों को और अधिक सुदृढ़ करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि साइप्रस लंबे समय से क्षेत्रीय विवादों का केंद्र रहा है और वहां की भू-राजनीतिक स्थिति उसे अंतरराष्ट्रीय रणनीति में महत्वपूर्ण बनाती है। लेखक का मत है कि भारत और साइप्रस के बीच रक्षा, समुद्री सुरक्षा, तकनीकी सहयोग तथा ड्रोन और आधुनिक रक्षा प्रणालियों से जुड़ी साझेदारी भविष्य में दोनों देशों के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकती है।
लेखक ने यह भी कहा कि भारत आज एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी भूमिका को लगातार मजबूत कर रहा है। ऐसे में विभिन्न क्षेत्रों में मित्र देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से आवश्यक है। उनका मानना है कि हिंद महासागर क्षेत्र से लेकर भूमध्यसागर तक रणनीतिक साझेदारियों का विस्तार भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में केवल आर्थिक शक्ति ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि रक्षा सहयोग, तकनीकी क्षमता और सामरिक साझेदारियां भी किसी देश की वैश्विक स्थिति को निर्धारित करती हैं। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में रक्षा उत्पादन, आधुनिक सैन्य तकनीक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, जिसका प्रभाव वैश्विक मंचों पर भी दिखाई दे रहा है।
लेखक के अनुसार, भारत–साइप्रस रक्षा सहयोग भविष्य में एक “गेम चेंजर” साबित हो सकता है। उनका कहना है कि यह साझेदारी न केवल दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई देगी, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक रणनीतिक संतुलन पर भी सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारत अपनी संतुलित, स्वतंत्र और राष्ट्रीय हितों पर आधारित विदेश नीति के माध्यम से विश्व राजनीति में और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाता रहेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत की विदेश और रक्षा नीति में ऐसे सहयोगों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है, जिससे देश की सामरिक स्थिति को वैश्विक स्तर पर मजबूती मिलेगी।
