*फौजी से मुख्यमंत्री तक – जनरल खंडूरी के जीवन में सैनिक संस्कारों की छाप”एक सैनिक, एक नेता, एक नायक: महेंद्र पाल सिंह रावतअध्यक्ष पूर्व सैनिक संघर्ष समिति*

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“फौजी से मुख्यमंत्री तक – जनरल खंडूरी के जीवन में सैनिक संस्कारों की छाप”
एक सैनिक, एक नेता, एक नायक

लेख: जनरल को पूर्व सैनिक की ओर से समर्पित : लेखक पूर्व सैनिक संघर्ष समिति के अध्यक्ष महेंद्र पाल सिंह रावत।।।

साथियों,
मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी का जीवन एक सैनिक डायरी है। पन्ने बदले, भूमिका बदली, पर वर्दी की सलवटें उनके हर फैसले में दिखती रहीं। राजनीति में भी वो जनरल ही रहे।
आपने राष्ट्र प्रथम के संकल्प की पाठशाला को 1954 में इंजीनियर्स कोर जॉइन कर प्रारंभ किया। 36 साल देश के लिए बॉर्डर पर पुल बनाए, बारूदी सुरंगें हटाईं। 1971 के युद्ध में उन्होंने सिखाया कि “इंजीनियर का फावड़ा भी बंदूक से कम नहीं”। यहीं से मिला सबक, देश के लिए रास्ता बनाना है, रोड़ा नहीं। कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ ऑपरेशन में भी वही फौजी जुगाड़: कम संसाधन में ज्यादा काम। लेकिन आपने सेवाउपरांत संसद में भी परेड ग्राउंड वाला अनुशासन दिखाया। 1991 में सांसद बने तो दिल्ली को भी छावनी बना दिया। अटल जी की सरकार में सड़क परिवहन मंत्री बने।
फौजी स्टाइल में काम किया – “स्वर्णिम चतुर्भुज” और “प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना” को ऑपरेशन की तरह चलाया। खुद को “चीफ इंजीनियर” कहते थे। अफसरों से कहते: “टारगेट टाइम पर पूरा करो, दुश्मन इंतजार नहीं करता”। सुबह 6 बजे साइट इंस्पेक्शन। ठेकेदारों में खौफ था कि खंडूरी जी कभी भी औचक निरीक्षण पर आ सकते हैं। बिल्कुल वैसे जैसे यूनिट में कमान अधिकारी रात को बैरक चेक करता है।
आपने राजनीतिक जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी जनरल की कमांड रही। सैनिक छाप में मुख्यमंत्री बने तो सचिवालय को “कमांड हेडक्वार्टर” बना दिया। इसके बाद फौजी फैसले आने लगे: 88 दिन में लोकायुक्त बिल। क्योंकि फौज में सीखा था कि दुश्मन यानी भ्रष्टाचार पर हमला तेज और निर्णायक होना चाहिए। इसके बाद अफसरों को साफ कहा “या तो काम करो, या कोर्ट मार्शल के लिए तैयार रहो”। देहरादून में फाइलें 7 दिन से ज्यादा नहीं रुकती थीं। लाल बत्ती उतरवाई। बोले “जनरल की गाड़ी पर भी बत्ती सिर्फ युद्ध में जलती है, VIP बनने के लिए नहीं”। 80 साल की उम्र में भी रिटायर नहीं, ‘रि-एम्प्लॉयड’। रक्षा समिति के अध्यक्ष बने। 85 साल की उम्र में 100% उपस्थिति। जवान लड़कों जैसे जोश से संसद जाते। विपक्ष के नेता ने कहा था “खंडूरी जी समिति नहीं चलाते, ब्रिगेड चलाते हैं”। रिपोर्ट समय पर, सवाल सटीक। क्योंकि फौज सिखाती है कि मोर्चे पर नींद हराम है, पर ड्यूटी नहीं।
हम कह सकते हैं कि खंडूरी जी के हर काम पर फौज की चार मुहरें लगती थीं👉
(क) मिशन मोड सेना में टारगेट मिला तो पूरा करना ही है। वही जिद राजनीति में लाए। PMGSY गांव तक पहुंची क्योंकि जनरल ने इसे युद्ध स्तर पर लिया।
(ख) ईमानदारी = रेजिमेंट की इज्जत फौजी के लिए यूनिट की इज्जत सबसे ऊपर। खंडूरी जी के लिए उत्तराखंड की इज्जत सबसे ऊपर। 28 साल में एक भी दाग नहीं। कहते थे “मैं जनरल हूँ, रिश्वत लेकर अपनी पलटन का सिर नहीं झुका सकता”।
(ग) लीड फ्रॉम फ्रंट जनरल सबसे आगे चलता है। खंडूरी जी बाढ़ हो या भूस्खलन, खुद मौके पर जाते। रैनी आपदा में 78 साल की उम्र में पैदल चलकर गांव पहुंचे।
(घ) सादगी = सोल्जर का गुर मेस में खाना, बैरक में रहना। मुख्यमंत्री आवास में भी सिपाही वाली थाली। मेट्रो से संसद गए क्योंकि फौज सिखाती है कि अफसर और जवान में फर्क रैंक का है, रुतबे का नहीं।
आज के भारत के लिए फौजी सबक
खंडूरी जी का जीवन एक मैसेज है राजनीति को अगर फौज की तरह चलाया जाए तो देश बदल सकता है। जहाँ भ्रष्टाचार हो वहाँ कोर्ट मार्शल हो। जहाँ काम हो वहाँ शाबाशी मिले। जहाँ जनता हो वहाँ जनरल खुद खड़ा हो।
क्योंकि एक सच्चा फौजी रिटायरमेंट के बाद भी देश के लिए ड्यूटी पर रहता है।

आज पूर्व सैनिक समाज की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि

“एक जनरल अनंत यात्रा पर चले गए , पर उसकी परेड खत्म नहीं हुई” – आज पूर्व सैनिकों की टोपी झुक हुई है । हमारी रेजिमेंट यानि ( पूर्व सैनिक समाज) का वो कमांडर चला गया जिसने वर्दी उतारने के बाद भी देश की लड़ाई लड़ी। सैनिकों को राजनीतिक जीवन में आने के लिए प्रेरित किया।

वो जनरल चले गए जिन्होंने कहा था
“भ्रष्टाचार देश का सबसे बड़ा दुश्मन है और इस दुश्मन पर गोली नहीं, कानून की हथौड़ी चलनी चाहिए।” 36 साल बॉर्डर पर दुश्मन से लड़े। 28 साल दिल्ली-देहरादून में भ्रष्टाचार से लड़े। हथियार बदले, पर जंग का मैदान वही रहा, भारत माता।

आज हम पूर्व सैनिकों का सीना गर्व से चौड़ा है और आंखें नम हैं। गर्व है कि वो हमारे बीच से थे। नम हैं क्योंकि अब सचिवालय में कोई अफसरों से ये नहीं कहेगा कि “या तो काम करो, या कोर्ट मार्शल के लिए तैयार रहो”। खंडूरी जी ने हमें सिखाया कि फौजी सिर्फ मोर्चे पर नहीं मरता। फौजी उस दिन मरता है जिस दिन वो अन्याय के सामने चुप हो जाए। और हमारा जनरल आखिरी सांस तक बोलते रहे, लड़ते रहे।
पूर्व सैनिक समाज का संकल्प – हे जनरल, आपने जो भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोला था, वो मोर्चा अब हम संभालेंगे। आपकी सादगी, आपकी ईमानदारी, आपका ‘काम किया है, काम करेंगे’ का नारा अब हर पूर्व सैनिक की बंदूक बनेगा।

नमन। सलाम। जय हिंद।

महेंद्र पाल सिंह रावत अध्यक्ष
पूर्व सैनिक संघर्ष समिति।

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