” गढ़वाली शौर्य की अविरल यात्रा” – 1887 से 2026 तक
जय हिंद,
साथियों,
लैंसडाउन की धरती पर इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, पत्थरों और प्रतिमाओं में भी सांस लेता है। जब मैं 1984 में भारतीय सेना के गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हुआ तो गढ़वाली सिरका के विषय में जानकारी नहीं थी लेकिन धीरे धीर रेजिमेंट के इतिहास के साथ बढ़ने का अवसर मिला तो पता चला कि ये प्रतिमाएं गढ़वालियों के वैभवशाली इतिहास के जीवंत ध्वजवाहक है जहां एक ओर “GARHWALIS CIRCA 1887” की ये दो मूर्तियां हैं जो बता रही हैं कि गढ़वाली जवान का साहस कोई नया नहीं है। हाथ में ली-एनफील्ड राइफल, सिर पर पारंपरिक टोपी और आंखों में वही चमक जो आज के जवान में है। दूसरी ओर 13 मई 2026 का वो दृश्य है जब शहीद भवानी दत्त जोशी परेड ग्राउंड की लाल सीढ़ियों पर पीढ़ियों का संगम हुआ।
गढ़वाल राइफल्स ने 1887 से 2026 तक 139 साल साल के शानदार सफर में वर्दी बदली, हथियार बदले, युद्ध बदले, पर नहीं बदला तो गढ़वाली का जज्बा। *एक नई परंपरा का जन्म*
13 मई 2026 को हुआ जब गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर लैंसडाउन ने वो कर दिखाया जो पहले कभी नहीं हुआ।
*"GARHWALIS CIRCA 1887" से सीख* – इस प्रतिमा के *दो जवान मानो हर उस समारोह को देखकर कह रहे हों कि हमने जिस परंपरा की नींव 1887 में रखी थी, वो आज भी जिंदा है।* तब भी गढ़वाली पहाड़ जैसा अटल था, आज भी है। तब भी ‘नाम, नमक, निशान’ के लिए जीता था, आज भी जीता है *13 मई 2026 का आयोजन हम लोगों को तीन स्वर्णिम संदेश देता है*– *विरासत से वर्तमान तक का स* 1887 की प्रतिमा और 2026 का सम्मान समारोह एक ही बात कहता है कि गढ़वाल राइफल्स एक रेजिमेंट नहीं, एक परिवार है। यहां वर्दी उतारने के बाद भी जवान ‘भुलु-बुलु’ यानी छोटे-बड़े भाई के रिश्ते से बंधा रहता है। *युवाओं को मशाल:* जब लैंसडाउन में ट्रेनिंग ले रहा रिक्रूट 1887 के जवानों की प्रतिमा देखता है और फिर 2026 में सम्मानित होते पूर्व सैनिकों को देखता है, तो समझ जाता है कि उसे 139 साल पुरानी विरासत को आगे ले जाना है। *सम्मान ही संस्कार है*– गढ़वा रायफल्स ने समाज में काम कर रहे पूर्व सैनिकों को मंच देकर बताया कि असली कमांडर वो है जो लड़ाई के साथ-साथ संस्कार भी गढ़े। यह पहल पूरे देश की फौज के लिए मिसाल है *शौर्य, सम्मान और भाईचारा* – शहीद भवानी दत्त जोशी परेड ग्राउंड की सीढ़ियों पर बैठे सेवारत और सेवानिवृत्त सैनिकों के चेहरे पर वही मुस्कान थी जो 1887 की प्रतिमा वाले जवानों के चेहरे पर कल्पना की जा सकती है। सीने पर पदक बता रहे थे कि *"एक सैनिक कभी सेवानिवृत्त नहीं होता, वह केवल आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बन जाता है।"* लैंसडाउन ने फिर साबित कर दिया कि यहां पत्थर भी बोलते हैं और वर्दी भी। 1887 की प्रतिमा गवाह है कि गढ़वाली तब भी चट्टान था। 13 मई 2026 का समारोह गवाह है कि गढ़वाली आज भी चट्टान है। *क्योंकि अपने नायकों को सम्मान देना ही एक महान राष्ट्र और महान रेजिमेंट की पहचान है।*
वीर भोग्या वसुंधरा
बद्रीविशाल लाल की जय
महेंद्र पाल सिंह रावत अध्यक्ष
पूर्व सैनिक संघर्ष समिति।
