गढ़वाल का लाल – सूबेदार दरवान सिंह नेगी, विक्टोरिया क्रॉस – एक मशाल आने वाली पीढ़ियों के लिए – एक गौरव गाथा पूर्व सैनिक महेंद्र की ✍️ से…………
जब पहाड़ का बेटा उठता है, तो इतिहास झुककर सलाम करता है। ऐसी ही एक गाथा है सूबेदार दरवान सिंह नेगी, विक्टोरिया क्रॉस की – हिम्मत, बलिदान और दूरदर्शिता की वो मिसाल जो हर हिंदुस्तानी के रोंगटे खड़े कर दे। उत्तराखंड की पहाड़िया जो अपनी ऊंचाई, दुर्गमता, विशालता और सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है इन्हीं पहाड़ियों में 4 नवंबर 1881 को पौड़ी गढ़वाल की ढांगू पट्टी के छोटे से गाँव कफारतीर, चौपता, तहसील कफ़कोट जिला चमोली में जन्म लिया ऐसे लाल ने जिसके घर में गरीबी थी, पर आँखों में पहाड़ जैसी ऊँचाई का सपना था। सन 1902 में मात्र 19 साल का नौजवान 1st गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हुआ। उस दिन कफरतीर की पगडंडी से जो सिपाही निकला, उसने फ्रांस के मैदान तक गढ़वालियों का मान और सम्मान पूरे विश्व में बड़ा दिया। ये वो रात जिसने दुनिया हिला दी – फेस्टुबर्ट, 23-24 नवंबर 1914 प्रथम विश्व युद्ध फ्रांस की बर्फीली खाइयाँ। जर्मनों ने हमारी पोस्ट छीन ली। नायक दरवान सिंह नेगी पहले ही घायल थे। सिर से खून बह रहा था। पलटवार का हुक्म हुआ। साथी बोले “नेगी, तू घायल है पीछे रह”। पर पहाड़ी ने जवाब दिया – “गढ़वाली पीछे नहीं हटता”। सिर में दूसरा गोला लगा, बांह फट गई, सीना छलनी। पर वो रुके नहीं। अकेले जर्मन खाई में कूद गए। बम, संगीन, राइफल – जो मिला उसी से दुश्मन को ढेर करते गए। एक-एक कर पोस्ट खाली कराई। जब तक आखिरी जर्मन भाग नहीं दिया, तब तक दरवान सिंह नेगी खड़े रहे। उनकी वीरता का यह विवरण लंदन के गजट ने लिखा है👇 ” For most conspicuous bravery… he gave a magnificent example of courage”. इस अदम्य साहस और असाधारण वीरता के
7 दिसंबर 1914 को ब्रिटिश सरकार ने घोषणा करी जिसमें नायक दरवान सिंह नेगी को – विक्टोरिया क्रॉस। पहला भारतीय जिसने विक्टोरिया जीता। 1915 में खुद किंग जॉर्ज पंचम ने फ्रांस में दरवान सिंह नेगी के सीने पर विक्टोरिया सजाया। उस दिन पूरी दुनिया ने कहा – ” हिंदुस्तान का सिपाही मर सकता है, पर झुक नहीं सकता”
सन 1923 में सूबेदार बनकर रिटायर हुए। अंग्रेज अफसर ने पूछा “नेगी, क्या इनाम लोगे? जागीर? पेंशन?” नायक दरवान सिंह नेगी हँसे और बोले: “साहब, मेरे लिए कुछ नहीं चाहिए। मेरे गढ़वाल के लिए दो चीज दे दो।”
पहला मेरे गाँव कफारतीर में स्कूल खोल दो। “मेरे गाँव के बच्चे अनपढ़ रह गए तो मेरा विक्टोरिया क्रॉस किस काम का? कलम का विक्टोरिया तलवार के विक्टोरिया से बड़ा होता है साहब।”
दूसरा – ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेल लाइन दो। “पहाड़ का जवान पलटन में मरने को तैयार है, पर उसकी माँ-बेटी हफ्तों पैदल चलकर अस्पताल पहुँचती है। रेल होगी तो पहाड़ जुड़ेगा, पहाड़ बढ़ेगा।”
अंग्रेजों ने स्कूल मंजूर किया। रेल का सपना उन्होंने देखा, जिसे आज 111 साल बाद भारत पूरा कर रहा है। 2026 में ऋषिकेश – कर्णप्रयाग रेल लाइन हकीकत बन रही है। पहाड़ के हर स्टेशन पर दरवान सिंह नेगी का नाम गूँजेगा।
सूबेदार दरवान सिंह विक्टोरिया क्रॉस आने वाली पीढ़ी के लिए तीन बिंदुओं को स्थापित कर गए
(क) हिम्मत – घायल हो, अकेले हो, फिर भी लड़ो। क्योंकि कायर की सौ साल की जिंदगी से बहादुर की एक दिन की जिंदगी बेहतर है।
(ख) दूरदर्शिता– जंग जीतने के बाद असली जंग शुरू होती है – अपने लोगों को पढ़ाने की, जोड़ने की। विक्टोरिया क्रॉस जीता तो स्कूल माँगा, जागीर नहीं।
(ग) मिट्टी से मोह – नाम दुनिया में हुआ, पर दिल अपने कफारतीर में ही रहा। जो अपनी जड़ों को नहीं भूलता, इतिहास उसे नहीं भूलता।
आज भी जिंदा है विक्टोरिया क्रॉस सूबेदार दरवान सिंह नेगी का जज्बा 24 जून 1950 को वो अनंत यात्रा पर चले गए। पर देहरादून छावनी के चीड़बाग युद्ध स्मारक पर उनकी कांस्य प्रतिमा आज भी जवानों से कहती है ” उठो, लड़ो, जीत कर आओ “।
इस लेख के माध्यम से नई पीढ़ी के नौजवानों को कुछ कहना चाहता हूं– तुम्हारे हाथ में मोबाइल है, उनके हाथ में बंदूक थी। तुम्हारे सामने करियर का सवाल है, उनके सामने देश का सवाल था। वो जीते क्योंकि उनके लिए देश पहले था। पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी - दोनों बेकार नहीं जाती। आईएएस बनो, डॉक्टर बनो, फौजी बनो, किसान बनो - पर जो भी बनो, दरवान सिंह नेगी की तरह अपने गाँव, अपने देश के लिए कुछ करके जाओ। किसी भी प्रकार के नशे से दूर रहो समाज को किसी न किसी रूप में अपना सहयोग दे यही सच्ची भारतीयता होगी
*गढ़वाल राइफल्स के इस पहले परमवीर को नमन।*
उस स्कूल के हर बच्चे को नमन जो आज उनकी बदौलत पढ़ रहा है।
उस रेल के हर मुसाफिर को नमन जो कल उनके सपने पर सफर करेगा।
बद्री विशाल की जय
जय हिंद।
महेंद्र पाल सिंह रावत अध्यक्ष
पूर्व सैनिक संघर्ष समिति
