शौर्य, सम्मान और भाईचारा, गढ़वाल राइफल्स की नई मिसाल 2026 का “द्विवार्षिक सम्मेलन
लैंसडाउन की वो लाल कारपेट वाली सीढ़ियां फिर इतिहास की गवाह बनीं। वही सीढ़ियां जिन पर कभी हमारे नौजवान कदमों ने देश रक्षा की कसम खाई थी, आज उन्हीं सीढ़ियों पर पीढ़ियों का संगम हुआ। यह केवल एक समूह फोटो नहीं, यह भारतीय सेना के गौरवशाली अतीत और उज्ज्वल वर्तमान के बीच का जीवंत सेतु है। क्योंकि ब्रिगेडियर विनोद नेगी, वीएसएम, कमांडेंट गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर लैंसडाउन की एक नई पहल, एक नई परंपरा को पंख लगे जब 13 मई 2026 को गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर लैंसडाउन ने इतिहास रच दिया। ब्रिगेडियर विनोद नेगी, वीएसएम, कमांडेंट के प्रेरणादायक नेतृत्व और लेफ्टिनेंट जरनल डीएस राणा, पीवीएसएम, एवीएसएम वाईएसएम, सेना मेडल, पीएचडी , कर्नल ऑफ गढ़वाल राइफल्स एवं गढ़वाल स्काउट्स के करकमलों से पहली बार रेजिमेंट ने उन पूर्व सैनिकों को विशेष रूप से सम्मानित किया जो सेवा के बाद भी सामाजिक क्षेत्रों में राष्ट्र निर्माण में जुटे हैं। यह सम्मान बताता है कि फौजी की ड्यूटी सीमा पर ही खत्म नहीं होती। वर्दी उतरने के बाद भी वो समाज का सिपाही बना रहता है। यह सम्मान समारोह शौर्य, सम्मान और भाईचारा के प्रतीक शहीद भवानी दत्त जोशी परेड ग्राउंड में हुआ। पीछे लहराता गढ़वाल राइफल्स का रेजिमेंटल ध्वज बीच में शहीद की प्रतिमा और दोनों ओर रखी तोपें मानो कह रही थीं कि गढ़वाली शौर्य की गाथा कभी पुरानी नहीं होती। लाल कारपेट पर एक साथ बैठे सेवारत अधिकारी, सफेद बालों वाले पूर्व सैनिक और गर्व से सिर उठाए वीर नारियां। यह दृश्य हर फौजी के सीने को चौड़ा कर देने वाला था। इस पहल के तीन प्रमुख प्रेरक स्तंभ रहे है –
(क) विरासत का सम्मान– रेजिमेंट ने संदेश दिया कि रिटायरमेंट सिर्फ कागज पर होता है। एक गढ़वाली सैनिक हमेशा अपनी पलटन का अभिन्न हिस्सा रहता है। वर्दी भले उतर जाए, पर ‘गढ़वाली’ पहचान कभी सेवानिवृत्त नहीं होती।
(ख) युवाओं के लिए प्रेरणा – जब लैंसडाउन में ट्रेनिंग ले रहा जवान अपने सामने पदकों से सजे पूर्व सैनिकों को सम्मानित होते देखता है, तो उसके मन में एक ही बात आती है कि बलिदान और कर्तव्य का रास्ता ही सबसे बड़ा सम्मान दिलाता है।
(ग) अटूट बंधन: ‘भुलु-बुलु’ की परंपरा – गढ़वाल राइफल्स की पहचान ‘भुलु’ यानी छोटा भाई और ‘बुलु’ यानी बड़ा भाई का रिश्ता है। यह आयोजन उस भावनात्मक धागे को और मजबूत करता है। यहां रैंक नहीं, सिर्फ रिश्ते बोलते हैं। इस समारोह में हर एक सेवारत और पूर्व सैनिम के चेहरे पर मुस्कान, सीने पर पदक, दिल में देश – इन वीरों के चेहरों की मुस्कान और सीने पर चमकते पदक एक ही बात कह रहे थे, “एक सैनिक कभी सेवानिवृत्त नहीं होता, वह केवल आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बन जाता है।”
ब्रिगेडियर विनोद नेगी की यह सोच कि समाज सेवा में लगे पूर्व सैनिकों को मंच देकर सम्मानित किया गया, पूरे देश के लिए मिसाल है। यह बताता है कि कमांडर सिर्फ लड़ाई ही नहीं लड़ाते, वो संस्कार भी गढ़ते हैं।
महान राष्ट्र की पहचान –गढ़वाल राइफल्स की यह पहल सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, एक संदेश है। संदेश यह कि अपने नायकों को सम्मान देना ही एक महान राष्ट्र और महान रेजिमेंट की पहचान है। लैंसडाउन की इन सीढ़ियों ने फिर साबित कर दिया कि वर्दी भले उतर जाए, पर फौजी भाईचारा और देशभक्ति की भावना कभी सेवानिवृत्त नहीं होती।
बद्री विशाल लाल की जय
जय हिंद,
महेंद्र पाल सिंह रावत अध्यक्ष
पूर्व सैनिक संघर्ष समिति।
