*पुरुषोत्तम मास या अधिक मास, मलमास, क्या है महत्व, क्यों रहते हैं शुभ कार्य वर्जित इस वर्ष 17 मई से 15 जून तक रहेंगे मलमास* ***आलेख तथा संकलन ऋषि कण्डवाल ( विद्वान लेखक उत्तराखण्ड सरकार में सिंचाई राज्य मंत्री हैं)***

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17 मई से 15 जून तक पुरुषोत्तम मास ।
नहीं किए जाएंगे मांगलिक कार्य –

17 मई से पुरुषोत्तम मास आरंभ हो रहा है जो 15 जून तक
रहेगा । अतः इस महीने में सभी मांगलिक काम बिवाह, गृहप्रवेश आदि बंद हो जाते हैं।

आइए इस विषय पर एक सूक्ष्म चिंतन करें –

हिंदू धर्म में पुरुषोत्तम मास (अधिक मास या मलमास) को आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है, लेकिन सांसारिक मांगलिक कार्यों (जैसे विवाह, गृह प्रवेश) के लिए इसे वर्जित माना गया है। इसके शास्त्रीय कारण प्रमुख रूप से पौराणिक कथाओं और ज्योतिषीय गणना पर आधारित हैं: –
१. पौराणिक कारण स्वामी विहीन मास


  1. अधिपति विहीन मास

शास्त्रों के अनुसार, सौर वर्ष और चंद्र वर्ष में अंतर (लगभग 11 दिन) को पाटने के लिए हर तीसरे वर्ष एक अतिरिक्त महीना आता है। भारतीय ज्योतिष में बारह महीनों के बारह देवताओं (जैसे सूर्य, विष्णु, शिव) को स्वामी माना गया है। चूँकि यह अतिरिक्त मास (अधिक मास) होता है, इसलिए इसका कोई स्वामी देवता नहीं था।
‘मल मास’ कहलाना: स्वामी न होने के कारण इसे पहले ‘मल मास’ या ‘अशुद्ध मास’ माना जाता था, जिससे इसमें कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता था।
पुरुषोत्तम मास का नाम: पौराणिक कथा के अनुसार, जब मल मास की दुर्दशा हुई, तो वह भगवान विष्णु के पास गया। विष्णु जी ने कहा, “अब से मैं इस महीने का स्वामी हूँ और इसे ‘पुरुषोत्तम मास’ के रूप में जाना जाएगा,”। हालाँकि, इसका स्वभाव ‘मलमास’ वाला ही रहा, जिससे मांगलिक कार्य वर्जित माने गए।

२. ज्योतिषीय कारण …..

सूर्य संक्रांति का अभाव
संक्रांति न होना
ज्योतिषीय दृष्टि से, जब किसी महीने में सूर्य राशि परिवर्तन नहीं करते (सूर्य संक्रांति नहीं होती), तो उसे ‘मलमास’ या ‘खरमास’ कहा जाता है। पुरुषोत्तम मास में सूर्य किसी भी राशि में प्रवेश नहीं करते।

शुभता की कमी – ज्योतिष में शुभ कार्यों के लिए सूर्य की संक्रांति का होना अत्यंत आवश्यक माना गया है। चूँकि इस महीने में यह प्रक्रिया नहीं होती, इसलिए इसे मांगलिक कार्यों के लिए दोषपूर्ण या ‘अशुभ’ (अशुद्ध) समय माना जाता है।

३. आध्यात्मिक कारण….. पूजा-साधना के लिए समर्पित -*

  1. कर्मकांड का विराम -शास्त्रों के अनुसार, पुरुषोत्तम मास का उद्देश्य सांसारिक सुख-सुविधाओं की शुरुआत करने के बजाय स्वयं को भगवान विष्णु की पूजा, दान, व्रत, और धर्म-कर्म (जैसे भगवद्गीता, भागवत कथा, तुलसी पूजन) में लगाना है।
    सात्विक ऊर्जा: यह महीना मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि के लिए होता है। माना जाता है कि इस दौरान किए गए सकाम कर्म (कामना पूर्ति के लिए काम) का फल अच्छा नहीं होता, जबकि निष्काम पूजा का फल हजार गुना मिलता है। पुरुषोत्तम मास में वर्जित मुख्य कार्य (१७ मई – १५ जून २०२६):

विवाह, सगाई
गृह प्रवेश
मुंडन संस्कार
यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार
नया व्यवसाय शुरू करना या कीमती संपदा खरीदना

निष्कर्ष ….

पुरुषोत्तम मास में मांगलिक कार्यों के बंद होने का मुख्य कारण स्वामी का अभाव और सूर्य संक्रांति का न होना है, जिसके कारण इसे विशुद्ध रूप से ईश्वर की आराधना के लिए ही उपयुक्त माना जाता है। आलेख और संकलन ऋषि कण्डवाल (विद्वान लेखक उत्तराखण्ड सरकार में सिंचाई राज्य मंत्री हैं)

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