हिंदी दिवस : आत्मगौरव और राष्ट्रीय एकता का स्वर
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥”
भारतेन्दु हरिश्चंद्र
भारत की माटी में एक ऐसी भाषा रची-बसी है जो केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि करोड़ों हृदयों की धड़कन है। वह भाषा जो तुलसी के रामचरितमानस में भक्ति बनकर बहती है, सूर के पदों में वात्सल्य बनकर छलकती है, कबीर की साखी में क्रांति बनकर गूँजती है और प्रेमचंद के गोदान में किसान की पीड़ा बनकर उतरती है, वही भाषा हिंदी है। प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को हम उसी गौरवमयी भाषा का जन्मोत्सव मनाते हैं, जिसे हम हिंदी दिवस के नाम से जानते हैं।
👉. इतिहास के पृष्ठों में हिंदी दिवस
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् जब भारत अपने संविधान का निर्माण कर रहा था, तब सबसे बड़ा प्रश्न था कि इस विशाल देश की राजभाषा क्या होगी? 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में एक ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। लंबी चर्चा के बाद हिंदी को भारत संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अंतर्गत देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ।
इस निर्णय के सूत्रधारों में काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविंददास और व्योहार राजेन्द्र सिंह का योगदान अविस्मरणीय है। यह संयोग है कि 14 सितंबर को ही व्योहार राजेन्द्र सिंह जी का 50वाँ जन्मदिन भी था।
इसी ऐतिहासिक क्षण को चिरस्थायी बनाने के लिए 1953 से, तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में, प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। पहला हिंदी दिवस 14 सितंबर 1953 को मनाया गया था।
👉. हिंदी – केवल भाषा नहीं, संस्कृति है
हिंदी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। विश्व के 150 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी का पठन-पाठन होता है। अमेरिका, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद, नेपाल और जर्मनी जैसे देशों में हिंदी का सम्मानजनक स्थान है।
हिंदी का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना है। अपभ्रंश से होते हुए, शौरसेनी, ब्रज, अवधी, भोजपुरी और खड़ी बोली के रूप में यह विकसित हुई। अमीर खुसरो को हिंदी का प्रथम कवि कहा जाता है।
हिंदी साहित्य का इतिहास चार कालों में विभाजित है – आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल। भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्णिम युग है।
हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता है – जैसा लिखा जाता है, वैसा ही पढ़ा जाता है। इसकी लिपि देवनागरी विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपियों में से एक है।
“हिंदी हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति का सरलतम स्रोत है।”
सुमित्रानंदन पंत
👉. वर्तमान चुनौतियाँ
क) हीन भावना: आज भी अनेक अभिभावक हिंदी को पिछड़ेपन का प्रतीक मानते हैं, जो सबसे घातक सोच है।
ख) तकनीकी शब्दावली का अभाव: चिकित्सा, अभियांत्रिकी और न्याय के क्षेत्र में हिंदी को और समृद्ध करना शेष है।
ग) भाषाई प्रदूषण: “मैंने उसे कॉल किया” जैसी मिलावटी भाषा से बचना होगा।
👉. समाधान और हमारा दायित्व
क) शिक्षा में: प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए। नई शिक्षा नीति 2020 में इसी पर बल दिया गया है।
ख) कार्यालयों में: हमें अपने हस्ताक्षर, नामपट्ट हिंदी में लिखने में गर्व होना चाहिए।
ग) तकनीक में: हिंदी आज तकनीक में सबसे तेजी से बढ़ने वाली भाषा है। हमें यूनिकोड में हिंदी टाइपिंग को बढ़ावा देना होगा।
घ) दैनिक जीवन में: हमें अपने बच्चों को पंचतंत्र और प्रेमचंद की कहानियाँ सुनानी होंगी।
👉. उपसंहार
हिंदी दिवस केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन है। हिंदी ने हमें जोड़ा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिंदी सेतु का कार्य करती है। यह गंगा-जमुनी तहजीब की भाषा है।
आइए, इस हिंदी दिवस पर हम संकल्प लें कि हम हिंदी का सम्मान करेंगे।
“हिंदी है भारत की बिंदी, इसको नमन करो।
भाषा नहीं, यह भाव है, इसका जतन करो॥”
जय हिंद! जय हिंदी! जय भारत!
नोट – इस आलेख को तैयार करने में विभिन्न प्रामाणिक संदर्भों की सहायता ली गई है।
संकलन एवं प्रस्तुति-
राजीव थपलियाल (प्रधानाध्यापक)
_राजकीय प्राथमिक विद्यालय मेरुड़ा, जयहरीखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड
