*दीसा दान — मायके की थाप और बेटी के सुख की* पहाड़ की संस्कृति बेटी का ससुराल और मायके के बीच संदेशवाहक औजी के गीत* पहाड़ की संस्कृति को बहुत सुंदर शब्दों में उकेरा है* *आलेख राजीव थपलियाल*

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दीसा दान — मायके की थाप और बेटी के सुख की दुआ

समय कितना निर्मम होता है। जो कल तक हमारी सांसों में बसता था, जो हमारी बोली, हमारे गीत और हमारे आंगन की मिट्टी में घुला हुआ था, वही आज इतिहास के किसी पन्ने में धूल फांक रहा होता है। गढ़वाल की लोक संस्कृति का भी एक ऐसा ही पन्ना है — “दीसा दान”। न कोई शिलालेख, न कोई सरकारी दस्तावेज़। बस बुजुर्गों की स्मृति, ढोल-दमाऊ की गूंज और औजियों के कंठ में बसी एक मीठी सी कसक। आज जब हम चैत्र की हवा में केवल “स्कूल की छुट्टियां” और “नए सत्र” ढूंढते हैं, तब कभी इसी बयार में मैत की थाप तैरती थी। वह थाप जिसमें ममता थी, मिट्टी की सौंधी गंध थी और एक मां का अनकहा आशीर्वाद था। वह थाप जो रिश्तों को जिलाने वाली थी, दूरियों को पाटने वाली थी, और दो घरों के बीच प्रेम का सेतु बनने वाली थी।

पहाड़ में बेटी का विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं माना जाता था। यह दो कुलों का मिलन था, दो गांवों का संगम था। जब डोली विदा होती थी तो पूरा गांव गवाह होता था। मां का कलेजा मुंह को आता था, पिता चुपचाप आंगन की मुंडेर ताकता था। सबके मन में एक ही प्रार्थना होती — “हे इष्ट देवता, हमारी बिटिया को ससुराल में सुख देना।” पर सुख का समाचार मायके तक पहुंचेगा कैसे? उस युग में संचार के साधन सीमित थे। ऐसे में मायके और ससुराल के बीच जो जीवंत कड़ी बनी, उसका नाम था — औजी। औजी गढ़वाल के पारंपरिक लोक-गायक और वादक थे। ये वही लोग थे जिनकी उंगलियों में ढोल-दमाऊ बोलता था और जिनके कंठ में लोकगीत जीवित थे। ये विवाह, जन्म, मुंडन जैसे संस्कारों में मंगल गीत गाते थे। चैत्र मास आते ही ये अपना ढोल-दमाऊ लेकर निकल पड़ते। उद्देश्य एक ही — “मैत की खबर ल्याण”। ये पैदल चलकर दूर-दूर के गांवों में जाते और बेटियों का हालचाल पूछते।

ससुराल के गांव में पहुंचकर औजी गांव के देवता को प्रणाम करते। फिर अनुमति लेकर बेटी के ससुराल के थाडू यानी आंगन में जाते। ढोल की पहली थाप के साथ ही घर के लोग समझ जाते कि मायके से कोई आया है। इसके बाद औजी खुदेड़ और चैती जैसे लोकगीत गाते। इन गीतों में मायके के गांव, खेत-खलिहान और परिजनों का हाल होता। इन स्वरों को सुनकर ससुराल में व्यस्त बेटी का मन भर आता। वह काम छोड़कर आंगन में आती। औजी उसे मायके का समाचार सुनाते। इस 10-15 मिनट की भेंट में बेटी को महीनों का सुकून मिल जाता। उस समय औजी केवल गायक नहीं थे। वे संदेशवाहक थे और सांस्कृतिक कड़ी थे।

समय के साथ जब बेटी ससुराल में रच-बस जाती और गृहस्थी संभाल लेती, तो गांव में कहा जाता — “फलां की बिटि न ससुराल ह्वे खाई ग्यायी”। अर्थात बेटी ने ससुराल को अपना लिया है, वह वहां सुखी है। बेटी के सुखी होने का समाचार मिलते ही औजी फिर जाते। पर इस बार बधाई लेकर। ससुराल के आंगन में बधाई गीत गाए जाते। इसके बाद ससुराल पक्ष औजी का आदरपूर्वक स्वागत करता और प्रेमपूर्वक नेग देता। इस नेग को दीसा दान कहा जाता था। लोक में “दीसा” शब्द को “दिशा देने” और “दान” को “सम्मान देने” से जोड़ा जाता है। इस प्रकार दीसा दान का भावार्थ हुआ — “बेटी के सुखी गृहस्थ जीवन के लिए दिया गया सम्मान और आशीर्वाद”। इसी प्रकार के नेग को कुछ क्षेत्रों में “खुर” भी कहा जाता था। यह कोई मांग या लेन-देन नहीं था। यह सम्मान था और आभार था। मायके का आभार कि आपने हमारी बेटी को अपनाया। ससुराल का सम्मान कि आप बेटी का हाल पूछने आए। इस परंपरा से औजी को मान मिलता, मायके को संतोष मिलता और ससुराल की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती।

गढ़वाली लोकसाहित्य में इस परंपरा की झलक मिलती है। बिरहा और बधाई गीतों में मायके की याद और बेटी के सुख की कामना के भाव मिलते हैं। इन गीतों में शिकायत नहीं, केवल ममता और आशीर्वाद होता था। समय के साथ संचार के साधन बदले और जीवनशैली में बदलाव आया। मोबाइल और इंटरनेट के युग में प्रत्यक्ष रूप से औजी का जाना कम हो गया। पर दीसा दान की आत्मा आज भी प्रासंगिक है। आधुनिक दीसा दान हो सकता है — बिना कारण का हालचाल, बेटी और बहू को समान सम्मान, बच्चों को ननिहाल की संस्कृति से जोड़ना, और सुख-दुख में साथ खड़े रहना। तकनीक साधन है। 2 मिनट का औपचारिक संवाद नहीं, 10 मिनट की आत्मीय बातचीत ही आज की “मैत की थाप” है।

हमने विज्ञान में बहुत प्रगति की है। पर अपनी जड़ों को याद रखना भी उतना ही आवश्यक है। क्योंकि गढ़वाल केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है। गढ़वाल एक भाव है। एक सुर है। एक थाप है। और जब तक वह थाप हमारे दिलों में गूंजेगी, तब तक हमारी संस्कृति जीवित रहेगी। अंत में उन सभी औजियों को नमन, जिन्होंने अपनी कला से पीढ़ियों तक रिश्तों को जोड़े रखा। “खत्म ह्वे गे वो जमाना, पर गूंज आज भी बाकी छ… ढोल की थाप में, मैत की बोली में… नाम छे उसको — दीसा दान। अर्थ छे उसका — बिटि तू सुखी रै।”
(नोट- इस आलेख को तैयार करने में अन्य श्रोतों की मदद भी ली गयी है)*
संग्रह एवं प्रस्तुति:
राजीव थपलियाल
प्रधानाध्यापक
राजकीय प्राथमिक विद्यालय मेरुड़ा, जयहरीखाल
पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड

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