स्वच्छता: व्यक्ति से राष्ट्र तक का अनुशासन पर्व
एक शैक्षिक एवं सामाजिक चिंतन
लेखक: राजीव थपलियाल, प्रधानाध्यापक
रा.प्रा.वि. मेरूड़ा, विकासखंड – जयहरीखाल, पौड़ी गढ़वाल
प्रस्तावना
सभ्यता और संस्कृति का प्रथम लक्षण स्वच्छता है। जिस राष्ट्र की गलियाँ स्वच्छ होती हैं, वहाँ की सोच भी स्वच्छ होती है। स्वच्छता केवल बाह्य आवरण नहीं, अपितु अंतःकरण की पवित्रता का प्रतीक है। ऋषियों ने “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्” कहकर देह की शुचिता को धर्म का आधार माना। आधुनिक युग में स्वच्छता राष्ट्रीय विकास की अनिवार्य शर्त बन गई है।
1. स्वच्छता का शाब्दिक एवं दार्शनिक अर्थ
“स्वच्छ” शब्द “स्व” + “अच्छ” से बना है अर्थात् “जो स्वयं में अच्छा हो”। स्वच्छता का तात्पर्य मात्र मैल हटाना नहीं, वरन् विकार, अव्यवस्था और असंतुलन को दूर कर समरसता स्थापित करना है। महात्मा गांधी ने कहा था – “स्वच्छता स्वतंत्रता से भी अधिक महत्वपूर्ण है।” क्योंकि परतंत्र देह से व्यक्ति जी सकता है, परन्तु गंदे परिवेश में स्वस्थ समाज का निर्माण असंभव है।
2. स्वच्छता के बहुआयामी आयाम
स्वच्छता को हम पाँच स्तरों पर समझ सकते हैं:
- व्यक्तिगत स्वच्छता: यह आत्म-अनुशासन का प्रथम पाठ है। दैनिक स्नान, स्वच्छ वेशभूषा, स्वच्छ भोजन, स्वच्छ विचार – ये चारों मिलकर व्यक्तित्व को निखारते हैं। एक स्वच्छ विद्यार्थी ही कालांतर में स्वच्छ नागरिक बनता है।
- पारिवारिक एवं विद्यालयी स्वच्छता: घर और विद्यालय संस्कारों की प्रथम पाठशाला हैं। यदि बालक यहाँ सफाई का महत्व सीख ले, तो वह जीवन भर “स्वच्छता दूत” बना रहेगा। कक्षा, शौचालय, पेयजल, पुस्तकालय की स्वच्छता शिक्षक का दायित्व भी है और गौरव भी।
- सामुदायिक एवं पर्यावरणीय स्वच्छता: गाँव की नाली, मोहल्ले का कूड़ा, नदी का जल – ये सब हमारे सामूहिक आचरण का परिणाम हैं। वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्लास्टिक निषेध – ये सब स्वच्छता के ही पर्याय हैं।
- मानसिक एवं चारित्रिक स्वच्छता: तन के साथ मन की मैल भी धोनी होगी। ईर्ष्या, द्वेष, भ्रष्टाचार, असत्य – ये मन के कचरे हैं। विचारों की स्वच्छता के बिना सामाजिक स्वच्छता संभव नहीं।
- राष्ट्रीय स्वच्छता: “स्वच्छ भारत मिशन” इसी राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष है। 2 अक्टूबर 2014 को पूज्य बापू की 145वीं जयंती पर प्रारम्भ हुआ यह अभियान आज जन-आंदोलन बन चुका है।
3. स्वच्छता और शिक्षा का अन्योन्याश्रय संबंध
शिक्षक राष्ट्र निर्माता है। विद्यालय में स्वच्छता की अलख जगाने का दायित्व सर्वप्रथम शिक्षक पर है।
- आदर्श प्रस्तुति: शिक्षक स्वयं स्वच्छ वेश में आएँ, कक्षा स्वच्छ रखें, तो छात्र स्वतः अनुकरण करेंगे।
- पाठ्यक्रम में समावेश: भाषा, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान – हर विषय में स्वच्छता के सूत्र जोड़े जा सकते हैं।
- क्रियात्मक गतिविधियाँ: “स्वच्छता शपथ”, “स्वच्छता रैली”, “एक दिन एक घंटा सफाई” जैसी गतिविधियाँ चरित्र निर्माण करती हैं।
एक स्वच्छ विद्यालय ही “आदर्श गाँव” की नींव रखता है।
4. समकालीन चुनौतियाँ एवं समाधान
आज हम कोरोना, डेंगू, जलजनित रोगों से जूझ रहे हैं। इनका मूल कारण अव्यवस्थित स्वच्छता है।
समाधान:
- कानूनी दृढ़ता: एकल उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध को कठोरता से लागू करना।
- प्रौद्योगिकी का उपयोग: कचरा प्रबंधन में नई तकनीक, वेस्ट टू वेल्थ का सिद्धांत।
- जनजागरूकता: पंचायत से लेकर संसद तक स्वच्छता को प्राथमिकता।
- सामाजिक सहभागिता: “मेरा कचरा, मेरी जिम्मेदारी” की भावना जगाना।
5. दो अमर प्रेरणास्रोत
- महात्मा गांधी: सेवाग्राम आश्रम में वे स्वयं शौचालय साफ करते थे। उनका मानना था कि सफाई करने वाले का सम्मान करने से ही समाज उन्नत होगा।
- मेजर ध्यानचंद: अनुशासन और स्वच्छता उनके जीवन का मंत्र था। उन्होंने कहा था – “मेरा देश की जिम्मेदारी है मुझे आगे बढ़ाने की।” स्वच्छ देश ही आगे बढ़ेगा।
उपसंहार: एक संकल्प
सभी देशवासियों
आइए हम सब मिलकर यह प्रतिज्ञा लें:
“न मैं गंदगी करूँगा, न किसी को करने दूँगा।”
“विकसित हो राष्ट्र हमारा, स्वच्छ हो देश हमारा।”
यदि प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक विद्यालय, प्रत्येक गाँव स्वच्छ हो गया, तो “विकसित भारत” का हमारा स्वप्न साकार हो जाएगा। स्वच्छता केवल अभियान नहीं, यह जीवन शैली है। यही सच्ची राष्ट्रभक्ति है।
जय हिंद। वंदे मातरम्।
