“चुनावी भात, शहीदों के नाम और कोटद्वार का चीरहरण” – पढ़ने में तीखा कोटद्वार के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी!
✍️ लेखक: महेंद्रपाल सिंह रावत, पूर्व सैनिक, कोटद्वार
मित्रों,
चुनाव नजदीक आते ही सब कुछ याद आ जाता है। “बेल्ट और टोपी वाले”, शहीदों के परिजन, और सांस्कृतिक कार्यक्रम।
गाना होगा, शहीदों की चिंताओं पर लगेगे हर वर्ष मेले।
निमंत्रण आने लगते हैं – आओ दाल-भात खाओ, मंच पर ताली बजाओ, शहीदों के नाम पर जयकारा लगाओ।
और हम? हम भूल जाते हैं कि घर आकर किसका चीरहरण हुआ था। क्रार्यक्रम क्या था 🤔
कोटद्वार का आईना – 75 साल आजादी के बाद भी कोटद्वार वही खड़ा है।
शिक्षा नहीं – 2 लाख आबादी पर 1 भी सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं। बच्चे बाहर भागते हैं।
स्वास्थ्य नहीं – “बेस हॉस्पिटल” सिर्फ बोर्ड। रात को इमरजेंसी आए तो सीधे AIIMS।
रोजगार नहीं – सिडकुल खाली। ऑप्शन फौज, फॉर्म या दुकान। हर घर से पलायन।
सड़क नहीं – “गेटवे ऑफ गढ़वाल” बोलते हैं, पर गढ़वाल-कुमाऊं जोड़ने वाला स्टेट हाईवे तक नहीं। कंडी एलिवेटेड रोड फाइलों में दम तोड़ रही है। अब वन मार्ग बनेगा।
नेता का खेल और हमारा पाप – हर 5 साल होर्डिंग लगते हैं – “जिला कोटद्वार, पीजीआई, कण्व आश्रम, IT हब देंगे”। वोट मिलते ही नेता देहरादून। और हम? जाति-बिरादरी में बंटकर वोट देते हैं। 500 रुपये और दाल-भात में भविष्य बेच देते हैं। फिर 5 साल गाली देते हैं। अरे चुना किसने था? कल तक झोला छाप नेता आज करोड़पति।
और अनपढ़ जनप्रतिनिधि का झंडा एक पढ़ा- लिखा फौजी उठा रहा है। एक फ़ौज़ीबदसरे फौजी को गाली देते रहते है मै कैप्टन वो सिपाही
शर्म आनी चाहिए। झंडा उठाने का इतना शौक है तो सामाजबके सामग्र विकाश का तिरंगा उठाओ।
- सबसे बड़ा दर्द – शहीदों का अपमान
चुनाव में शहीदों के नाम पर बड़े मंच सजेंगे। माला, भाषण, ,हशर हुए फोटो। लेकिन वीर नारी बहन रेनू, बहन लाजवंती… जिनके पति कारगिल में शहीद हुए, वो आज 9-10 साल से न्याय के लिए कोर्ट के चक्कर काट रही हैं। शहादत के बदले मिली राशि से खरीदी 5 विश्वा जमीन को भी राजस्व दलालों ने कानूनी पचड़े में फंसा दिया। अब वीर नारियां दर-दर भटक रही हैं। अब सिर्फ माननीय न्यायालय पर ही भरोसा है। पूछता हूं – कौन पार्टी इनके साथ खड़ी है? कौन कोर्ट में साथ देता है? हम। मित्रों, एक साल में एक भेंट से आंसू नहीं सूखते। सम्मान तब है जब समस्या का समाधान हो। मंच से रावण रूपी अट्टहास बंद करो। जमीन पर जाकर उन माताओं के आंसू पोंछो। - गांव का सच – जड़ें कट रही हैं – आज गांव से आ रहा हूं। जिस गांव में मोटा अनाज होता था, आज 5 किलो राशन के चक्कर में गांव के किसानों ने खेती बंद कर दी। हम अपनी जड़ों से कट रहे हैं। और फेसबुक पर बिना सबूत के एक-दूसरे की टांग खींच रहे हैं। ये राजनीति नहीं, आत्महत्या है। अब क्या करें? तीन संकल्प आज से
- सवाल पूछो 👉 मंच पर खड़े होकर पूछो साहब विधान सभा में कितने सवाल पूछे? जिला कोटद्वार कहां है? पीजीआई कहां है? कंडी रोड कहां है? शहीद परिवारों को न्याय कब मिलेगा?_
भात तो मुर्दे के घर भी खाते हैं और पूछते भी हैं “कैसे मरे क्या हुआ था उनको?”😭। फिर जनता के पैसे के बड़े बड़े आयोजनों और जलसों में आप चुप क्यों जाते हो? क्यों नहीं अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल करते हो – कख च हमारी कंडी रोड, जिला, पीजीआई, नर्सिंग कॉलेज आदि आदि - एकजुट हो जाओ 👉 ग्रुप में एक-दूसरे पर कीचड़ मत उछालो। आक्षेप लगाना है तो सत्ताधारी पार्टी पर लगाओ, जिसको 5 साल की सत्ता दी है।
- मांग बदलो 👉 दाल-भात नहीं, कॉलेज-अस्पताल-रोजगार-न्याय मांगो। काम करो, भाषण नहीं।
सौ की एक बात
फौजी ने देश की सेवा की है। उसे पता है आपदा में बचाव कैसे होता है, अधिकारी से कैसे बात होती है, संयम कैसे रखा जाता है।
वो भ्रष्टाचार सहन नहीं करता। तो फिर कोटद्वार के साथ ये अन्याय क्यों सहन कर रहा है? याद रखो – “जो 5 साल में 1 कॉलेज नहीं दे सकता, वो 5 मिनट में IIT नहीं देगा।”
“मंच पर शहीदों की जय और घर में शहीद की पत्नी दर-दर – यही है सम्मान?” आओ लामबंद हों। कोटद्वार को “पलायन का गेटवे” नहीं, “विकास का गेटवे” बनाना है।
दाल-भात से कोटद्वार का भविष्य नहीं सुधरेगा। हमें मालूम है जो दुरंगे है वो यहां भी और वहां भी मिलेंगे। फोटो आने दो उसका भी पोस्टमार्टम होगा।👨✈️
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