शपथ का वो दिन, जब पहाड़ का बेटा, हिंदुस्तान का रक्षक बनता है
आलेख – महेंद्र पाल सिंह रावत, पूर्व सैनिक कोटद्वार✍️
हर वर्दी की अपनी कहानी होती है, पर फौज की वर्दी की कहानी खून से लिखी जाती है। वो कहानी शुरू होती है लैंसडौन के *भवानी दत्त ग्राउंड* से, जिस दिन एक आम नौजवान *'कसम परेड'* के बाद *'जवान'* कहलाता है।
*ये शपथ सबसे अलग क्यों है* दुनिया में हजारों नौकरियाँ हैं। हर नौकरी में अनुबंध होता है - तनख्वाह के बदले काम। पर फौज में अनुबंध नहीं, *'समर्पण पत्र'* होता है। यहाँ ज्वाइन करते वक्त जवान दस्तखत अपनी कलम से नहीं, अपने लहू से करता है। वो शपथ लेता है कि *जरूरत पड़ी तो आखिरी गोली, आखिरी साँस तक लड़ेगा। वो वादा करता है कि उसका ताबूत तिरंगे में लिपटकर घर आएगा, पर वो पीठ दिखाकर नहीं आएगा। बताइए, ऐसी शर्त पर दस्तखत करने का हौसला दुनिया की किस यूनिवर्सिटी में सिखाया जाता है?* इसीलिए सेना नौकरी नहीं, जीवन-पद्धति' है।
*'बड़े चलो गढ़वालियों' से शुरू होती है नए जीवन की कदमताल* कसम परेड की सुबह लैंसडौन की फिजा ही बदल जाती है। *'बड़े चलो गढ़वालियों'* की धुन जब पहाड़ों से टकराती है, तो हर रिक्रूट के पाँव खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं। महीनों की ट्रेनिंग, उस्ताद के जूते, साथी की गाली - सब कुछ उस एक धुन में भूल जाता है।
ग्राउंड में सामने खड़ा *गढ़वाली सोल्जर का स्टैच्यू* चीख-चीख कर कहता है - " *देख बेटा, मेरे जैसे लाखों ने इसी मिट्टी के लिए जान दी है। अब तेरी बारी है।"* उस पल हर जवान की रीढ़ की हड्डी सीधी हो जाती है। डर खत्म, सिर्फ जिम्मेदारी बचती है।
*तीन कसमें जो एक पहाड़ी को प्रसिद्ध गढ़वाली भुला' बनाती हैं*– हमारा गढ़वाली भुला जब शपथ लेता है तो वो तीन बार जन्म लेता है।
पहली कसम *तिरंगे* की - भारत माँ के लिए। दूसरी कसम *श्रीमद्भगवद्गीता* की - धर्म और कर्तव्य के लिए। तीसरी कसम *भूम्याल, इष्ट और पितृ* की - उस पहाड़ के लिए जिसने उसे पाल-पोस कर बड़ा किया। जब वो कहता है *"देश के आन- बान- शान पर सब निछावर"*, तो वो हवा में नहीं कहता। वो कहता है उन पुरखों की याद में जिन्होंने 1947, 1962, 1971, 1999 में इसी वचन को निभाया था। गढ़वाली के लिए देशभक्ति भावना नहीं, *'पैतृक संपत्ति'* है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलती है।
किरमिची कैप –एक टोपी में पूरा हिंदुस्तान – परेड खत्म होते ही जब एक जवान दौड़कर अपनी किरमिची कैप माँ के सिर पर रखता है, तो वो नज़ारा देखने लायक होता है। उस टोपी का वजन सिर्फ कपड़े का नहीं होता। उसमें होता है माँ की सूनी गोद का दर्द, पिता की झुकी कमर का बोझ, और पूरे गाँव की उम्मीद। उस दिन माँ रोती है, पर ये आँसू कमजोरी के नहीं होते। ये आँसू ऐलान करते हैं कि “मेरा बेटा अब मेरा नहीं रहा, अब वो 140 करोड़ का है।”
*आज का रिक्रूट, कल की गाथा*– जो हाथ आज कसम खा रहे हैं, कल वही हाथ -20 डिग्री में सियाचिन पर ट्रिगर दबाएँगे। जो पैर आज ग्राउंड में परेड कर रहे हैं, कल वही पैर घुसपैठियों को खदेड़ेंगे।
‘युद्धाय कृतनिश्चय’ का मतलब किताबों में मत ढूँढना। इसे समझना है तो कसम परेड के बाद एक जवान की आँखों में देखना। वहाँ संकल्प है, समर्पण है, और है वो आग जो दुश्मन की छाती चीर देती है।
नए जवानों के लिए संदेश भुला, तूने आज वर्दी पहनी है। ये वर्दी सबसे पवित्र है, क्योंकि इसे हर रोज खून से धोया जाता है। इसकी इज्जत रखना। जब थक जाओ तो उस माँ को याद करना जिसने तेरी कैप सिर पर रखी थी। जब डर लगे तो उस तिरंगे को देखना जिसके सामने तूने कसम खाई थी।
देश तुझसे बड़ी उम्मीद करता है – बस इतनी कि जब जरूरत पड़े, तो तू पीछे न हटे।
लैंसडौन की इस मिट्टी को *शत-शत नमन*, जो हर साल देश को सैकड़ों रक्षक देती है।
जो कसम परेड से निकला, वो सिर्फ जवान नहीं, ‘अमर’ है।
बद्री विशाल लाल की
जय
जय हिंद

