जीवन का अंतिम सत्य – राख से अध्यात्म तक आलेख: पूर्व सैनिक महेंद्रपाल सिंह गोर्ला रावत कोटद्वार: लेखक गरिमामयी भारतीय सेना के पूर्व सैनिक संघर्ष समिति के अध्यक्ष हैं

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जीवन का अंतिम सत्य – राख से अध्यात्म तक
आलेख: पूर्व सैनिक महेंद्रपाल सिंह गोर्ला रावत कोटद्वार

“माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय।।”

आज एक ऐसी सच्चाई आपके साथ साझा कर रहा हूँ जो हम सबकी जिंदगी में आनी है, और अमिट है।

 दो दिन पहले सुबह मुक्तिधाम में एक दाह संस्कार में गया। देखा कि घाट का कर्मचारी चुपचाप राख और बचे हुए अवशेषों को समेटकर बोरे में भर रहा था। दृश्य बहुत कुछ कह रही है

  उस राख को देखकर मन में कई सवाल उठे। सबसे बड़ा सवाल: ये कौन था? न नाम, न पहचान, सिर्फ राख। आधे घंटे बाद जो पानी या मिट्टी में मिल जानी है। मृत्यु के बाद साथ जाता है केवल कर्मों का लेखा-जोखा। धन, पद, मकान, गाड़ी सब यहीं छूट जाते हैं। यमराज के दरबार में न बैंक बैलेंस पूछा जाता है, न रैंक। पूछा जाता है "क्या करके आए हो? किस बात का घमंड, किस बात का बैर? कहां गई इसकी मोह-माया, पद-प्रतिष्ठा, दौलत? सब खत्म।  

साथ रह गया तो सिर्फ इसका कर्म, व्यवहार और चरित्र।
शवयात्रा में लोग कह रहे थे “आदमी तो अच्छा था पर…”
बस इसी ‘पर’ में पूरी जिंदगी का सार छुपा है। वो ‘ पर ’ ही बताता है कि हमने जीते जी क्या खोया, क्या कमाया।

संतों ने कहा है “मरने के बाद वही रोएगा जो तुम्हारे व्यवहार से दुखी था, और वही तुम्हें याद करेगा जिसके साथ तुमने नेकी की थी।”
लोग याद रखते हैं कि आप पड़ोसी से कैसे बोले, समाज में कैसे उठे-बैठे, मदद की या मुंह मोड़ा। आपका आचार-व्यवहार ही आपकी असली पहचान है। साथियों, हम फौजी हैं। हमने मौत को वर्दी पहनकर गले लगाया है। सीमा पर शहीद होने वाला जवान भी राख होता है और महलों में रहने वाला सेठ भी राख होता है। फर्क सिर्फ इतना है शहीद को जमाना ‘अमर’ कहता है, क्योंकि उसके कर्म अमर थे। उसका चरित्र अमर था। उसकी कुर्बानी अमर थी।इसलिए आज इस राख के ढेर के सामने खड़े होकर तीन संकल्प लो:
(क) अहंकार त्यागो ये शरीर, ये पद, ये पैसा – सब किराए का है। नोटिस कभी भी आ सकता है।
(ख) कर्म सुधारो– क्योंकि ऊपर की अदालत में वकील नहीं चलता, सिर्फ कर्मों की फाइल चलती है।
(घ) ‘पर’ मिटाओ ऐसा जियो कि जब अर्थी उठे तो कोई ये न कहे कि “आदमी अच्छा था पर…”। लोग कहें – “एक फरिश्ता चला गया, नेकदिल इंसान था, समाज का सच्चा सिपाही था।” *याद रखो जब चिता की आग ठंडी होगी, तब तुम्हारी इज्जत की लौ जलती रहनी चाहिए लोगों के दिलों में न रैंक साथ जाएगी, न पेंशन। न मेडल जाएंगे, न मकान। साथ जाएगा तो सिर्फ तुम्हारा नाम, और वो भी तब जब तुमने नाम कमाया हो।

इसलिए आज से ही जीना शुरू करो ऐसी जिंदगी, कि मरने के बाद भी तुम जिंदा रहो – लोगों की दुआओं में, यादों में, मिसालों में।

यही असली विजय है। यही मोक्ष है। यही फौजी का धर्म है।

         

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