*दीपावली: सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं तथा धार्मिक मान्यताओं का पर्व: आलेख शिक्षक जे० पी० कुकरेती* लेखक एक ख्याति प्राप्त शिक्षक और रचनाकार हैं उनके समसामयिक तथा धार्मिक आलेख विभिन्न माध्यमों से समाज को पथ प्रदर्शित कर रहे हैं*
🌺 दीपावली पर्व – भारतीय संस्कृति का प्रकाश उत्सव– भारत त्योहारों की भूमि है, जहाँ प्रत्येक पर्व जीवन के किसी न किसी शुभ कार्य, पौराणिक कथा और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा हुआ है। दीपावली, जिसे दीपोत्सव कहा गया है, भारतीय परम्परा का भव्य और आध्यात्मिक पर्वों में से एक है। यह केवल एक दिन का नहीं, बल्कि पाँच दिवसीय आध्यात्मिक उत्सव है। यह पावन पर्व, जिसे “पंच-दिवसीय दीपोत्सव” के नाम से जाना जाता है, भारतीय संस्कृति का ऐसा सुनहरा त्योहार है जो, अन्धकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और निराशा पर आशा की जीत का प्रतीक है। यह पाँच दिनों तक चलने वाला महापर्व है, जिसकी शुरुआत धन्वन्तरि जयन्ती (धनतेरस) से होकर, नरक-चौदस (छोटी-दिवाली), दीपावली (मुख्य दीपावली, गणेश- लक्ष्मी पूजन व बग्वाल), गोवर्द्धन-पूजा और भैया-दूज (यम-द्वितीया) के साथ समाप्त होती है। प्रत्येक दिन का अपना विशिष्ट पौराणिक महत्व, पूजा विधि और सन्देश है। 1️⃣👩🎤 पौराणिक मान्यता एवं प्रचलित कथाएं- धन्वन्तरि जयंती (धनतेरस): पौराणिक मान्यता: यह त्योहार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन समुद्र मंथन के दौरान भगवान विष्णु के अंश, भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इन्हें आयुर्वेद और स्वास्थ्य का देवता माना जाता है। इसी कारण, इस दिन स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए इनकी पूजा की जाती है। *प्रचलित कथाएं : एक अन्य कथा के अनुसार, राजा हिम के पुत्र की कुण्डली में विवाह के चौथे दिन सर्पदन्श से मृत्यु का योग था। उनकी पत्नी ने चौथे दिन, सभी आभूषणों को मुख्य द्वार पर एकत्र कर ढेर लगा दिया और चारों ओर दीपक जला दिए। जब यमराज सर्प का रूप धारण करके आए, तो दीपकों के तेज और आभूषणों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं और वे वापस लौट गए। तभी से इस दिन को ‘यम दीपम्’ के नाम से भी जाना जाता है और अकाल मृत्यु से बचने के लिए यमराज के लिए दीपदान किया जाता है। 2️⃣👩🎤नरकचौदस (छोटी दिवाली): *पौराणिक मान्यता: यह त्योहार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राक्षस नरकासुर का वध किया था और उसकी कैद से सोलह हजार कन्याओं को मुक्त कराया था। नरकासुर के वध के बाद, लोगों ने दीप जलाकर खुशियाँ मनाईं। *अन्य मान्यता: इसे रूप चतुर्दशी भी कहते हैं क्योंकि मान्यता है कि इस दिन शरीर पर तेल लगाकर स्नान करने से रूप-सौंदर्य प्राप्त होता है और नरक जाने से मुक्ति मिलती है। 3️⃣👩🎤दीपावली (गणेश-लक्ष्मी पूजन): *पौराणिक मान्यता: यह त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। *राम कथा: सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, इसी दिन भगवान श्री राम चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके और रावण पर विजय प्राप्त करके अयोध्या लौटे थे। अयोध्या वासियों ने घी के दीपक जलाकर उनका भव्य स्वागत किया, जिससे अमावस्या की रात भी पूर्णिमा की तरह जगमगा उठी। *समुद्र मंथन: एक अन्य मान्यता के अनुसार, इसी दिन समुद्र मन्थन से माता लक्ष्मी प्रकट हुई थीं और उन्होंने भगवान विष्णु को पति रूप में स्वीकार किया था। इसलिए इस दिन धन और समृद्धि की देवी माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। गढ़वाली परंपरा में “बग्वाल” (जिसे कहीं-कहीं बगवाल भी कहा जाता है) एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक त्योहार है। इसका सम्बन्ध भी दीपावली के अवसर से जुड़ा हुआ है, परंतु इसका स्वरूप गढ़वाल की अपनी लोक- परंपराओं के अनुसार थोड़ा-सा भिन्न और विशिष्ट है। ‘बग्वाल’ शब्द का अर्थ है “बग्वाली” अर्थात दीपों का पर्व”। 🪔 2. धार्मिक महत्व -मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने वामन अवतार के रूप में बलि राजा को पाताल लोक भेजा था और उसी दिन देवी माता लक्ष्मी भी पृथ्वी पर आई थीं। गढ़वाल में इसे देवी-देवताओं की पूजा, पितरों के तर्पण और ग्राम-देवता (भूम्या- भूमिया) की पूजा-आराधना के रूप में भी मनाया जाता है। शाम के समय घरों, मन्दिरों और आँगनों में दीपक जलाए जाते हैं, जिससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और समृद्धि आती है। 🏞️ 3.सांस्कृतिक महत्व – यह पर्व सामूहिक उत्सव का रूप ले लेता है — गाँव के लोग एकत्र होकर दीप जलाते हैं और पारम्परिक- सांस्कृतिक नृत्य करते है। यह उत्सव प्रेम, भाईचारा और सामाजिक एकता का प्रतीक है। 🪶 4.लोक परंपराएँ – घर की सफाई, दीपदान, पूजा और मिठाई बाँटना (खील- बताशे, स्वाद, पकौड़ी) इस दिन की सामान्य परम्पराएँ हैं। 🐄🐎पालतू पशुओं की पूजा भी इस दिन की जाती है — विशेष रूप से गाय और बैल, क्योंकि वे समृद्धि के प्रतीक हैं। उनके मुंह और पैरों को धोकर, सींगों पर सरसों का तेल लगाकर खुले मैदान में पारम्परिक भोज फूलों से सुसज्जित करके (बाड़ी- झंगोरा का भात ) बड़े प्यार से दिया जाता है। कुछ स्थानों पर तेल और दीप दान करने की परम्परा भी है। जिसे शुभ माना जाता है। 4️⃣👩🎤गोवर्द्धन पूजा: पौराणिक मान्यता: यह पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है। इसकी मुख्य कथा भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी है। कथा: इन्द्र के अहंकार को तोड़ने के लिए, कृष्ण ने ब्रजवासियों से इंद्र की पूजा के बजाय गोवर्द्धन पर्वत की पूजा करने को कहा। क्रोधित होकर इंद्र ने ब्रज पर मूसलाधार वर्षा की। तब कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा (सबसे छोटी अँगुली) पर गोवर्द्धन पर्वत को उठाकर ब्रजवासियों और पशुओं की रक्षा की। तब से इस दिन गोवर्द्धन पर्वत और गौ-माता की पूजा की जाती है। 5️⃣👩🎤भैया-दूज (यम-द्वितीया): पौराणिक मान्यता: यह पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मनाया जाता है। कथा: यह पर्व यमराज और उनकी बहन यमुना के स्नेह का प्रतीक है। कथा के अनुसार, इसी दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर जाते हैं, जहाँ यमुना ने उनका स्वागत किया और तिलक लगाकर उन्हें भोजन कराया। यमराज ने प्रसन्न होकर वरदान दिया था कि जो भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाकर तिलक करवाएगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा। इसीलिए इसे यम-द्वितीया भी कहते हैं। 🛕 दीपावली के इन पावन त्योहार पर श्लोक-मन्त्रों सहित पूजा विधि- दीपावली के पाँचों पर्वों पर साफ-सफाई, नए वस्त्र धारण करना, रंगोली बनाना और घर को दीपों से सजाना मुख्य है। धनतेरस -संध्या काल में भगवान धन्वंतरि, कुबेर और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस दिन नए बर्तन, सोना या चांदी खरीदना शुभ माना जाता है। धन्वंतरि मन्त्र: ओम नमो भगवते वासुदेवाय धन्वंतरये अमृतकलश हस्ताय सर्व रोग विनाशनाय त्रैलोक्य नाथाय श्री महाविष्णवे नमः॥ यम दीपदान: घर के बाहर दक्षिण दिशा में एक चार मुख वाला दीपक जलाकर यमराज को समर्पित किया जाता है। नरक-चौदस- प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल मालिश करके स्नान करना चाहिए। इसे अभ्यंग स्नान कहा जाता है। स्नान के जल में अपामार्ग (चिरचिटा) के पत्ते डालना शुभ माना जाता है। शाम को यमराज के लिए दीपदान किया जाता है। दीपावली -स्थिर लग्न (जैसे वृषभ, सिंह या वृश्चिक) और प्रदोष काल में लक्ष्मी-गणेश की पूजा की जाती है। पूजा विधि: चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर गणेश जी को लक्ष्मी जी के दाहिनी ओर स्थापित करें। कलश, नवग्रह और षोडश मातृका का पूजन करें। लक्ष्मी-गणेश को फूल, माला, धूप, दीप, नैवेद्य (खीर, बताशे) और पाँच प्रकार के फल अर्पित करें। श्लोक:
“शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपदाम्। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥” लक्ष्मी मन्त्र: ओम श्रीं ह्रीं श्रीं कमलेकमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः॥ गणेश मन्त्र: वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ 🛕दीपावली के शुभ अवसर पर माता सरस्वती तथा हनुमान जी के पूजन का महत्व- दीपावली की रात्रि, जिसे महानिशा भी कहते हैं, माता लक्ष्मी, भगवान गणेश, माता सरस्वती और हनुमान जी की पूजा के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। 🕉️माता सरस्वती का पूजन: महत्व: धन (लक्ष्मी) का सही उपयोग तभी संभव है जब उसके साथ ज्ञान (सरस्वती) और बुद्धि (गणेश) हो। ज्ञान के बिना प्राप्त धन अस्थिर और हानिकारक हो सकता है। इसलिए, दीपावली के दिन लक्ष्मी जी के साथ माता सरस्वती की पूजा की जाती है ताकि घर में धन के साथ विद्या, कला और विवेक का वास हो। ✅पूजन: व्यापारी वर्ग इस दिन अपने बही-खातों, कलम और तराजू की पूजा करके सरस्वती जी का आह्वान करते हैं। 🛕हनुमान जी का पूजन: 🕉️महत्व: दीपावली की रात हनुमान जी की पूजा का विशेष महत्व है, खासकर उन लोगों के लिए जो शत्रु बाधा, कर्ज, भय या किसी नकारात्मक शक्ति से परेशान हैं। हनुमान जी को संकटमोचक और बल-बुद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है। ✅पूजन: इस दिवस पर हनुमान चालीसा या सुन्दरकाण्ड का पाठ करना शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने और जीवन में स्थिरता तथा सुरक्षा लाने के लिए अत्यन्त शुभ माना जाता है। गोवर्धन पूजा – इस दिन घर के आँगन या पूजा स्थल पर गोबर से गोवर्द्धन पर्वत की आकृति बनाकर पूजा की जाती है। अन्नकूट (विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ और दाल) का भोग लगाया जाता है। गौ-माता की पूजा और सेवा की जाती है। मन्त्र: लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता। घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु॥ भैया दूज-बहनें भाई के माथे पर तिलक लगाती हैं और उनकी लम्बी आयु तथा मंगल की कामना करती हैं। भाई उन्हें उपहार देते हैं। कई स्थानों पर बहनें यमुना नदी में स्नान करने भी जाती हैं। तिलक मन्त्र: गंगा पूजे यमुना को, यमी पूजे यमराज को। सुभद्रा पूजे कृष्ण को, मेरा भाई पूजे मेरी बहन को॥ ✍️इतिहास की नजरों में दीपावली का महत्व- दीपावली का त्योहार केवल पौराणिक मान्यताओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी बहुत गहरा है: 👩🎤जैन धर्म में महत्व: जैन धर्म के अनुसार, इसी दिन भगवान महावीर स्वामी को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसलिए जैन समुदाय इसे निर्वाण दिवस के रूप में मनाता है और दीपक जलाकर ज्ञान के प्रकाश को याद करता है। 👩🎤सिख धर्म में महत्व: सिख इतिहास में इस दिन को बन्दी छोड़ दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1619 ई. में सिखों के छठवें गुरु, गुरु हरगोबिंद सिंह जी को मुगल बादशाह जहाँगीर की कैद से मुक्त किया गया था। उनके साथ 52 राजाओं को भी रिहा किया गया था, जिन्होंने गुरु जी का वस्त्र पकड़कर जेल से बाहर कदम रखा था। अमृतसर में स्वर्ण मंदिर को दीपों से सजाया जाता है। 🧏♂️व्यावसायिक महत्व: भारत में दीपावली से ही व्यापारी वर्ग के लिए नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत होती है। इस दिन व्यापारी अपने पुराने बही-खातों को बंद करके नए बही- खातों (मुहूर्त पूजन) का आरंभ करते हैं, जो उनके व्यवसाय में शुभता का प्रतीक है। 📒दीपावली के शुभ अवसर पर घटित प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएं- दीपावली पर्व से जुड़ी कुछ प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएँ इस प्रकार हैं: ✍️राजा विक्रमादित्य : पौराणिक काल के महान सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ था, जिसने उनके शासनकाल को एक ऐतिहासिक महत्ता प्रदान की। ✍️आर्य समाज : आधुनिक भारत के इतिहास में, आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती को इसी दिन (दीपावली की रात्रि) निर्वाण प्राप्त हुआ था। 🕯️दीपावली पर घटित प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएँ – 527 ई.पू. — भगवान महावीर का निर्वाण। 56 ई.पू. — दक्षिणी क्षेत्र में विक्रम संवत् का प्रारंभ। (कुछ क्षेत्रों में यह चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को भी माना गया है।) 1619 ई. — गुरु हरगोविंद जी की कारावास से मुक्ति। 1883 ई. — महर्षि दयानंद सरस्वती का स्वर्गारोहण। ✅वर्तमान परिपेक्ष में महत्व तथा आयोजन का उचित तरीका- वर्तमान समय में दीपावली का महत्व कई गुना बढ़ गया है। यह केवल धार्मिक आस्था का पर्व न रहकर सामाजिक समरसता, पर्यावरण चेतना और आर्थिक उन्नति का प्रतीक बन गया है। ❓महत्व: ✍️स्वच्छता अभियान : वर्तमान में दीपावली से पूर्व घरों की साफ-सफाई, जिसे स्वच्छता से जोड़ा जाता है, एक बड़ा सामाजिक अभियान बन गया है, जो हमें बाहरी और आन्तरिक दोनों तरह की अशुद्धियों को दूर करने का संदेश देता है। ✍️पर्यावरण चेतना: पटाखों से होने वाले प्रदूषण के कारण अब लोग ग्रीन दिवाली (प्रदूषण रहित दिवाली) मनाने पर जोर दे रहे हैं। ✍️आर्थिक सहयोग: स्वदेशी वस्तुओं की खरीद और स्थानीय कारीगरों के दीयों व खिलौनों को अपनाने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलता है। ✨💫आयोजन का उचित तरीका: ✅सुरक्षित और प्रदूषण-मुक्त दिवाली: तेज आवाज वाले और अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों से बचना चाहिए। इसके बजाय, पारम्परिक दीयों को जलाकर और रंगोली बनाकर पर्व मनाया जाए तो उचित रहेगा। ✅परोपकार: दीपावली के अवसर पर केवल अपने घर को सजाने की बजाय, जरूरतमंदों को वस्त्र, मिठाई और दीये भेंट करके उन्हें भी खुशियों में शामिल करना अति उत्तम रहेगा। ✅पारिवारिक मेल-जोल: भाग-दौड़ भरी जिंदगी में यह पर्व पूरे परिवार को एक साथ आने, रिश्तों को मजबूत करने और बड़ों का आशीर्वाद लेने का एक सुंदर अवसर प्रदान करता है। ✍️✅इन पांचो त्योहारों के अवसर पर क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए ❓❓ दीपावली के पाँच दिवसीय पर्व के दौरान सकारात्मकता और शुभता बनाए रखने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है: ✅✅क्या करना चाहिए (अवश्य करना चाहिए) ✨क्या नहीं करना चाहिए (इससे बचना चाहिए) ❌ ❌ 🛕सम्पूर्ण स्वच्छता: घर के हर कोने की अच्छे से सफाई करनी चाहिए। स्वच्छता दरिद्रता को दूर कर लक्ष्मी जी के आगमन का मार्ग प्रशस्त करती है। अस्वच्छता/गंदगी: घर में कहीं भी कूड़ा या गंदगी न रखें, विशेषकर पूजा स्थल और मुख्य द्वार के आस-पास। | ✨दीये जलाना: घर को, विशेषकर मुख्य द्वार को, तेल के दीयों से सजना शुभ होता है। सकारात्मक ऊर्जा के लिए दीयों की लौ बाहर की ओर होनी चाहिए। खंडित दीपक: पूजा में टूटे हुए (खंडित) दीपक, मूर्तियों या बर्तनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। लक्ष्मी-गणेश पूजा: शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से माता लक्ष्मी और भगवान गणेश का पूजन अवश्य करना चाहिए। झगड़ा/कलह: घर में किसी भी प्रकार का झगड़ा, कलह या नकारात्मक सम्वाद से बचना चाहिए। यह व्यवहार माता लक्ष्मी को अप्रसन्न करता है। दान-पुण्य: यथा सम्भव अपनी सामर्थ्य के अनुसार गरीबों, जरूरतमंदों और पशुओं को भोजन, वस्त्र या धन दान करना भी शुभ होता है। अति-खर्च/कर्ज: दिखावे के लिए अत्यधिक खर्च या इस दौरान कर्ज लेना उचित नहीं है। धनतेरस पर खरीदारी: सामर्थ्य अनुसार सोना, चांदी, बर्तन या धातु की कोई शुभ वस्तु खरीद सकते हैं। मूलत: यह त्यौहार स्वास्थ्य, सम्पदा, शान्ति, समृद्धि, अध्यात्म, आन्तरिक चेतना से जुड़ा हुआ है। तामसिक आहार: दिवाली के पांचों दिन मांस, मदिरा या अन्य तामसिक वस्तुओं का सेवन पूर्णत वर्जित है। भाई-बहन का सम्मान: भाई दूज भाई-बहन का एक-दूसरे के प्रति सम्मान और प्रेम प्रकट करने का अवसर होता है। पुराने दीयों का उपयोग: पूजा में इस्तेमाल हुए मिट्टी के दीयों को पुन: मुख्य रूप से इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। शांति और सकारात्मकता: मन को शान्त रखें, क्रोध से बचें और शुभ विचारों को महत्व दें। जुए का खेल: जुआ या किसी भी तरह का सट्टा-व्यवहार खेलना न केवल अशुभ माना गया है बल्कि सनातन परम्पराओं में एक कुरीति का प्रवेश भी षड्यंत्र के तहत किया गया है। अतः इससे पूर्णत: बचना चाहिए। 🛕✍️🕉️ सनातन सांस्कृतिक परम्पराओं में त्योहारों-पर्वो या मेलों का आयोजन समरसता, आपसी भाईचारा, मेल-मिलाप और सौहार्दपूर्ण वातावरण को सम्मिलित करते हुए आयोजन किए जाने का वर्णन प्राप्त होता है, अर्थात सामूहिक पर्वों- त्योहारों में मुहूर्त के साथ-साथ उत्साह, उमंग, आपसी सौहार्द, एक जुटता-मेल मिलाप जैसी मानवीय भावनाओं को महत्व प्रदान किया गया है। इसलिए वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी सार्वजनिक त्योहारों की तिथियों को लेकर किसी भी प्रकार से भ्रमित न रहें। ये सभी तिथियाॅं शुभ तथा उपासना योग्य हैं, क्योंकि ये किसी न किसी रूप में हमारे आराध्य से जुड़ी हुई हैं। अपनी सांस्कृतिक धरोहरों में पूर्ण विश्वास रखिए और किसी भी विभाजनकारी नीतियों व शंकायुक्त निर्णयों से स्वयं को और समाज को बचाए रखें।
✅✅करना चाहिए: ✅ घर की स्वच्छता एवं दीप सज्जा। ✅ गौ, ब्राह्मण, निर्धन व श्रमिकों का आदर और दान। ✅ पर्यावरण-सम्मत उत्सव मनाना। ✅ परिवार के साथ मिलकर आरती और दीपदान करना। ✅”स्वच्छ दीपावली – हरित दीपावली” का संकल्प लेना चाहिए। ❌ ❌ नहीं करना चाहिए: ❌ अत्यधिक पटाखे जलाना या शोर प्रदूषण फैलाना। ❌ दिखावे में खर्च कर धार्मिकता भूल जाना। ❌ पशु-पक्षियों को कष्ट पहुँचाना। ❌ नशा, जुआ या अपवित्र कार्य करना। 🌟 उपसंहार- दीपावली का वास्तविक अर्थ है — “अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा”। यह केवल दीपों का उत्सव नहीं, बल्कि मन, विचार और कर्म को आलोकित करने का संदेश है। जब प्रत्येक व्यक्ति अपने अंतःकरण में दीप जलाएगा, तभी सच्ची दीपावली होगी। “तमसो मा ज्योतिर्गमय।” (हे प्रभु! हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।)