*कोटद्वार रेलवे स्टेशन और अतिक्रमण — खूबसूरत चेहरे पर दाग महेंद्र पाल सिंह रावत, अध्यक्ष पूर्व सैनिक संघर्ष समिति*
अमृत भारत योजना के तहत कोटद्वार रेलवे स्टेशन का विस्तार हुआ, नए गेट बनाए गए और स्टेशन को आधुनिक स्वरूप दिया गया। यह निश्चित रूप से स्वागतयोग्य पहल है।
लेकिन सवाल यह है कि नए और खूबसूरत रेलवे गेटों के ठीक सामने वर्षों पुराने खोखे और अतिक्रमण क्यों दिखाई देते हैं?
यह दृश्य ऐसा लगता है जैसे *किसी खूबसूरत चेहरे पर दाग।*
आखिर ये दाग किसे अच्छे लग रहे हैं?
राजनीति अतिक्रमण को गरीबी से जोड़ती है, प्रशासन इसे अतिक्रमण कहता है और आम नागरिक इसे अपनी आँखों के सामने व्यवस्था की विफलता के रूप में देखता है। गरीब की रोजी-रोटी का सम्मान होना चाहिए, लेकिन *गरीबी के नाम पर सार्वजनिक जमीन और पैदल रास्तों पर स्थायी कब्जे को उचित नहीं ठहराया जा सकता।*
दूसरी ओर, बारिश में बस का इंतजार करते बुजुर्गों और महिलाओं को खड़े होने की जगह तक न मिलना और दुकानों के आगे दो मिनट खड़े होने पर भी रोक देना—यह सिर्फ जमीन का नहीं, *हमारी सोच का भी अतिक्रमण है।*
हमें तय करना होगा – सार्वजनिक जगह किसकी है?
अतिक्रमणकारी की या आम नागरिक की?
प्रशासन अतिक्रमण हटाए, लेकिन गरीबों की आजीविका के लिए उचित वैकल्पिक व्यवस्था भी करे।क्योंकि *रेलवे की जमीन से अतिक्रमण हटाना प्रशासन का काम है, लेकिन अपने मन की जमीन से अतिक्रमण हटाना हम सबकी जिम्मेदारी है।*
आखिर सवाल फिर वही है— नए गेट खूबसूरत हैं, लेकिन उनके सामने लगे ये दाग किसे अच्छे लग रहे हैं। आलेख: महेंद्र पाल सिंह रावत, अध्यक्ष पूर्व सैनिक संघर्ष समिति।
