धर्म का मार्ग:शिवलिंग पर जल क्यों चढ़ाया जाता है….आलेख ऋषि कण्डवाल जी, लेखक उत्तराखण्ड सरकार में राज्यमंत्री हैं

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शिवलिंग पर जल क्यों चढ़ाया जाता है….
आइए समझते हैं शिवलिंग पर जल क्यों चढ़ाया जाता है। इससे पहले समझते हैं कि शिवलिंग क्या है। शिवलिंग प्रकृति और पुरुष के मेल को कहा जाता है। शिवलिंग का स्वरूप प्रकृति और पुरुष के रूप में माना जाता है। आइए इसे विस्तारित रूप से समझने का प्रयास करते हैं। शिवलिंग प्रकृति यानी माता जो कि इस धरती को माना जाता है। धरती हमारी माता के समान है। जिसमें सभी प्रकार के जीव जंतु पशु मनुष्य तथा वनस्पति फल फूल पेड़ पौधे आदि तमाम तरह के जीव जंतु वनस्पति पनपते हैं। और यहां प्रकृति की ही देन है कि इनके लिए सभी प्रकार के अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराये गये है। पुरुष के अर्थ को आकाश के स्वरूप में माना गया है। जो हमें वर्षा तथा धूप छांव तथा धरती में पनपने वाले जीव जंतु वनस्पति के लिए छत का इंतजाम करता है। पुरुष और प्रकृति लगातार सृजन क्रिया कर रहे हैं। इसी कारणवश हम प्रकृति और पुरुष की इस सृजन व्यवस्था को सिंबॉलिक शिवलिंग के रूप में पूजा करते हैं।।


इस पर जल क्यों चढ़ाया जाता है?
इसे भी थोड़ा समझते हैं।आज सब जानते हैं कि सावन के महीने में जल चढ़ाने के मान्यताएं होती हैं। इसके पीछे के तर्क को समझने से पहले मैं आपको 51 शक्ति पीठ में से 1 शक्ति पीठ की ओर ले चलता हूं जिसे मां कामाख्या के नाम से जाना जाता है। जी हां यह माता के शरीर में से योनि वाला भाग यहां इस स्थान पर गिरा था। इस शक्तिपीठ के विषय में यहां बताना चाहते हैं। कि यहां प्रकृति में अप्रैल-मई के महा गर्मी वाले दिनों तथा बंजरता वाले दिनों को भोगने के बाद जुलाई के महीने में माता की योनि से रक्तस्राव होता है। जिसके कारण 3 दिन के लिए मंदिर द्वार बंद कर दिए जाते हैं। और उसी दौरान हल्की बारिश होती है। तब किसान अपने खेत जोतने के लिए तैयार कर लेता है। और उन्हीं 3 दिनों के पश्चात बड़ी जोर-शोर से मंदिर खोला जाता है और लाखों की संख्या में वहां जनसैलाब दर्शन के लिए आता है इसको भी सिंबॉलिक तरीके से देखने पर हम पाते हैं। कि जो जुलाई का महीना होता है वहां वर्षा ऋतु की दस्तक देता है। जब धरती में समाए हुए तमाम तरह के बीच पैदा होते हैं उन्हें गर्भ मिल जाता है। और वहां पनपते रहते हैं। सभी को राहत मिलती है। क्योंकि पिता रूपी आकाश (शिव) ने धरती रूपी प्रकृति याने की (शक्ति) की गोद हरिभरी कर दी है। जो की खुशियों का संकेत लेकर आई है। प्रकृति और पुरुष के समामेलन से जो ऊर्जाये तथा घर्षण पैदा होती है। उसे शांत और निरंतरता बनाए रखने के लिए धरती रूपी (शक्ति) तथा आकाश रूपी (शिव) के प्रतीकात्मक रूप शिवलिंग पर जल चढ़ाया जाता है।

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