*कोटद्वार बस अड्डा आदर्श मानवता बनाम विकृत मानसिकता का दर्पण**लेखक: महेंद्र पाल सिंह रावत, पूर्व सैनिक, कोटद्वार*

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कोटद्वार बस अड्डा आदर्श मानवता बनाम विकृत मानसिकता का दर्पण

लेखक: महेंद्र पाल सिंह रावत, पूर्व सैनिक, कोटद्वार

  आज प्रातः मैं अपने मित्र के पुत्र को कोटद्वार रोडवेज स्टेशन छोड़ने गया। बीरोंखाल की बस अपने नियत समय से विलंबित थी। नया बस अड्डा निर्माणाधीन होने के कारण यात्रियों के बैठने की समुचित व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।  प्रतीक्षा के दौरान मेरी दृष्टि दो ऐसे दृश्यों पर पड़ी, जिन्होंने समाज में व्याप्त दो विरोधाभासी मानसिकताओं को उजागर कर दिया। ये दृश्य केवल कोटद्वार के नहीं, अपितु पूरे देश में फैलती उस संवेदनहीनता के परिचायक हैं, जहाँ निजी सुविधा के सामने सामूहिक हित गौण हो गया है।

पहला दृश्य– विवशता का प्रतीक मुख्य मार्ग की ओर, नहर के ऊपर बनी संकरी पटरी पर कुछ यात्री बैठे थे। उनमें वृद्धजन, महिलाएँ एवं छोटे बच्चे सम्मिलित थे। धूप तीव्र थी और बस का कोई अता-पता नहीं। ये लोग वहाँ अपनी इच्छा से नहीं, अपितु विवशता में बैठे थे क्योंकि बस अड्डे परिसर में कहीं भी छाया या बैठने का स्थान नहीं था। यह दृश्य मौन होकर समाज से आदर्श मानवता की माँग कर रहा था – कि कोई इन्हें एक कुर्सी दे दे, पीने को पानी पूछ ले, या कम से कम उनके बैठने की जगह को सम्मान दे।

दूसरा दृश्य– निर्मम स्वार्थ का प्रदर्शन उसी नहर की पटरी के दूसरी ओर एक व्यक्ति अपनी केतली से बार-बार पानी डालकर उस स्थान को गीला कर रहा था। जिज्ञासावश जब मैंने सोचा तो उत्तर एक ही था ” अगर जगह सूखी रहेगी तो लोग यहाँ बैठ जाएंगे ।”

 बअर्थात, एक व्यक्ति जानबूझकर सार्वजनिक स्थान को इसलिए अनुपयोगी बना रहा था, ताकि कोई वृद्ध या थका-हारा यात्री वहाँ विश्राम न कर सके। उसके लिए अपनी निजी पसंद किसी मनुष्य के आराम से अधिक मूल्यवान थी। *यह केवल अतिक्रमण नहीं है, यह मानसिकता का दिवालियापन है। *फोटोग्राफ की पीड़ा – जमीन पर बैठा बुजुर्ग* तस्वीर गवाह है कि  एक वयोवृद्ध व्यक्ति सड़क किनारे जमीन पर निढाल बैठे थे। पास में एक स्कूटी का सहारा लिए हुए थे। उनके चारों ओर बाजार की चहल-पहल थी - स्टॉल लगे थे, दुकानें सजी थीं। पर उस एक इंसान के लिए दो फीट की जगह किसी के पास नहीं थी।  क्या यह संभव नहीं कि वह बुजुर्ग भी ऐसी ही किसी "जानबूझकर गीली की गई" जगह से उठकर वहाँ बैठने को मजबूर हुए हों? फुटपाथ पर सामान तो सज सकता है, पर एक थके हुए इंसान के लिए जगह नहीं है। यह कैसी विडंबना है? *आदर्श मानवता के तीन स्तंभ*– यदि हम वास्तव में एक सभ्य समाज बनना चाहते हैं, तो हमें तीन स्तरों पर कार्य करना होगा:–
  1. व्यक्तिगत संवेदना यदि कोई सार्वजनिक स्थान को जानबूझकर खराब कर रहा है, तो उसके स्थान पर यदि वही व्यक्ति दो कुर्सियाँ निकालकर कहता – “बाबूजी, धूप तेज है, आप यहाँ बैठ जाइए” – तो समाज का चित्र ही बदल जाता। इज्जत पैसे से नहीं, व्यवहार से कमाई जाती है।
  2. नागरिक कर्तव्य – फुटपाथ, सड़क, नहर की पटरी – ये किसी की निजी संपत्ति नहीं हैं। ये सार्वजनिक सुविधाएँ हैं और इन पर पहला अधिकार पैदल यात्रियों, वृद्धों, दिव्यांगों और बच्चों का है। हमें यह समझना होगा कि सार्वजनिक स्थान पर सभी का समान अधिकार है। अतः मेरी तीन विनम्र अपील हैं:–
  3. समस्त नागरिकों से सार्वजनिक स्थान पर अपना अधिकार जताने से पहले सोचिए कि आपके इस कृत्य से किसी असहाय को कष्ट तो नहीं हो रहा। पहले मनुष्य बनिए, फिर कुछ और।
  4. युवाओं से यदि किसी वृद्ध, बीमार या लाचार व्यक्ति को सड़क पर बैठा देखें, तो पूछ लें – “बाबूजी, कोई तकलीफ है?” आपका यह छोटा सा कार्य किसी के लिए जीवनदायी हो सकता है।
    जय हिंद,

महेंद्र पाल सिंह रावत अध्यक्ष
पूर्व सैनिक संघर्ष समिति।

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