इंद्रमणि बडोनी जी को “उत्तराखंड का गांधी” कहा जाता है। वे उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सबसे प्रमुख स्तंभों में से एक थे। उनका जीवन सादगी, अहिंसा और जनसेवा का एक अनूठा उदाहरण था।
जन्म एवं प्रारम्भिक जीवन : 24 दिसम्बर, 1924 को आज ही के दिन को टिहरी गढ़वाल के ‘अखौड़ी’ गाँव में।
शिक्षा: उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा टिहरी से प्राप्त की और बाद में देहरादून के डी.ए.वी. कॉलेज से स्नातक किया।
कला के प्रति प्रेम: वे ‘चौंफला’ और ‘केदार नृत्य’ के विशेषज्ञ थे। कहा जाता है कि 1956 में उनके नृत्य को देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी मुग्ध हो गए थे।
“उत्तराखंड का गांधी” क्यों कहा जाता है?
इंद्रमणि बडोनी को यह नाम उनके अहिंसक दृष्टिकोण और राज्य आंदोलन के प्रति उनके समर्पण के कारण मिला।
अहिंसक संघर्ष: उन्होंने अलग राज्य की मांग के लिए हमेशा शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक रास्तों को अपनाया।
ऐतिहासिक आमरण अनशन: 1994 में जब उत्तर प्रदेश सरकार (मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में) ने आरक्षण नीति लागू की, तो बडोनी जी ने इसके खिलाफ और पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर पौड़ी में आमरण अनशन शुरू किया। इसने पूरे पहाड़ में आंदोलन की आग सुलगा दी।
जननायक: वे बेहद सरल स्वभाव के थे और पहाड़ों की दुर्गम परिस्थितियों को करीब से समझते थे। उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों को एकजुट किया।
राजनीतिक सफर- वे तीन बार (1967, 1969 और 1977) उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य (विधायक) रहे।उन्होंने टिहरी रियासत के विलीनीकरण के बाद सामाजिक सुधारों में भी बड़ी भूमिका निभाई।
महत्वपूर्ण तथ्य-
मृत्यु : 18 अगस्त-1999 को उनका निधन हो गया। दुर्भाग्यवश, वे अपने सपनों के ‘उत्तराखंड राज्य’ को बनते हुए नहीं देख पाए।
लोक संस्कृति के सम्वाहक : वे केवल एक नेता नहीं बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति और पारम्परिक कलाओं के रक्षक भी थे।
स्व०इन्द्रमणि बडोनी जी का व्यक्तित्व आज भी उत्तराखंड के युवाओं और आन्दोलनकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
उत्तराखण्ड की महान विभूति इंद्रमणी बडौनी: आलेख तथा संकलन ख्यातिप्राप्त शिक्षक जे पी कुकरेती।
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