शिक्षक दिवस : गुरु-गौरव और राष्ट्र-निर्माण का पावन पर्व
5 सितंबर – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जयंती
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥” — कबीरदास
भारतीय संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। इसी गुरु-शिष्य परम्परा के गौरव को नमन करने के लिए हम प्रतिवर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाते हैं।
1. शिक्षक दिवस का इतिहास – 5 सितंबर को ही क्यों?
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुत्तानी में एक निर्धन परिवार में हुआ था और निधन 17 अप्रैल 1975 को हुआ। वे भारत के दूसरे राष्ट्रपति (1962-1967) थे। जब वे राष्ट्रपति बने तो शिष्यों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा व्यक्त की, तब उन्होंने सुझाव दिया कि उनके जन्मदिन को व्यक्तिगत रूप से मनाने के बजाय इसे शिक्षकों के सम्मान के दिन के रूप में मनाया जाए। तभी से 5 सितंबर को शिक्षक दिवस की परंपरा शुरू हुई।
2. बहुआयामी जीवन के अनछुए प्रेरणा-प्रसंग – डॉ. साहब कौन थे?
डॉ. राधाकृष्णन भारतीय दर्शन, शिक्षा और संस्कृति के महान चिंतक, शिक्षक, दार्शनिक और राजनेता थे।
- वे आंध्र विश्वविद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के कुलपति रहे।
- वे सोवियत संघ में भारत के राजदूत और यूनेस्को में भारत के प्रतिनिधि रहे।
- वे भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और बाद में द्वितीय राष्ट्रपति बने।
- वे ऑक्सफोर्ड में स्पाल्डिंग प्रोफेसर बनने वाले पहले भारतीय थे।
- 1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
3. शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान और प्रमुख कृतियाँ
उन्होंने शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र, विचार और व्यक्तित्व के विकास का साधन माना। उन्होंने भारतीय दर्शन को विश्व पटल पर प्रतिष्ठित किया।
उनकी विश्व-प्रसिद्ध पुस्तकें हैं – Indian Philosophy, The Hindu View of Life, An Idealist View of Life, Eastern Religions and Western Thought, The Bhagavadgita और The Philosophy of Rabindranath Tagore।
उनका मानना था – “पुस्तकें वह साधन हैं जिनके द्वारा हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं।”
4. भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान
हमारी संस्कृति में कहा गया है – आचार्य देवो भव।
“एक औसत शिक्षक बताता है, एक अच्छा शिक्षक समझाता है, एक उत्तम शिक्षक करके दिखाता है, पर एक महान शिक्षक प्रेरित करता है।” — विलियम आर्थर वार्ड
5. वर्तमान में शिक्षक की भूमिका और शिक्षक दिवस का उद्देश्य
शिक्षक दिवस का उद्देश्य – “शिक्षकों के योगदान, समर्पण और राष्ट्र-निर्माण में उनकी भूमिका को सम्मान देना।”
आज तकनीक सूचना दे सकती है, पर संस्कार नहीं। नई शिक्षा नीति 2020 ने भी शिक्षक को राष्ट्र-निर्माण की धुरी माना है। शिक्षक विद्यार्थियों को केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि अनुशासन, नैतिक मूल्य, तार्किक सोच, रचनात्मकता, आत्मविश्वास और सामाजिक जिम्मेदारी भी सिखाता है।
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार की शुरुआत 1958 में हुई थी, जो प्रतिवर्ष 5 सितंबर को उत्कृष्ट शिक्षकों को दिया जाता है।
6. उपसंहार – शिक्षक दिवस का वास्तविक संदेश
“राष्ट्र का भविष्य केवल उसकी आर्थिक या तकनीकी प्रगति से नहीं, बल्कि उसके विद्यार्थियों के ज्ञान, चरित्र और विचारों से निर्मित होता है। इसीलिए शिक्षक का सम्मान केवल एक दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए।”
“गुरू ब्रह्मा, गुरू विष्णु, गुरू देवो महेश्वर:। गुरू साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नम:॥”
“गुरु बिना ज्ञान नहीं, ज्ञान बिना सम्मान नहीं, सम्मान बिना प्रगति नहीं।”
जय शिक्षक! जय भारत!
नोट- इस आलेख को तैयार करने में अन्य प्रामाणिक संदर्भों की मदद भी ली गई है।
संकलन एवं प्रस्तुति- राजीव थपलियाल (प्रधानाध्यापक), राजकीय प्राथमिक विद्यालय मेरुड़ा, जयहरीखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड
