“बहन का प्रेम किसी प्रार्थना से कम नहीं होता, और भाई का साथ किसी वरदान से कम नहीं।”
रक्षाबंधन…
यह केवल श्रावण मास की पूर्णिमा को कलाई पर बँधने वाला एक रेशम का धागा मात्र नहीं है। यह स्नेह का वह सेतु है, जो दो हृदयों को, दो प्राणों को एक अटूट विश्वास के बंधन में बाँध देता है। यह पर्व केवल राखी बाँधने का उत्सव नहीं, अपितु जन्म-जन्मांतर तक सुख में मुस्कुराने और दुःख में कंधा बनने के मौन संकल्प का नाम है।
राखी की वह नन्हीं-सी गाँठ, बहन की आँखों में छिपी ममता, विश्वास और निश्छल अपनत्व की सम्पूर्ण कथा कह जाती है। वह धागा जब भाई की कलाई पर सजता है, तो वह केवल अपनी बहन की रक्षा का वचन नहीं लेता, बल्कि समस्त नारी जाति के सम्मान, उसकी गरिमा और उसकी अस्मिता की रक्षा का एक व्यापक प्रण भी बन जाता है।
आज हमारी बेटियाँ अब केवल आँगन की तुलसी नहीं रहीं, वे आकाश को नाप रही हैं। वे घर संभाल रही हैं, विद्यालयों में ज्ञान का दीप जला रही हैं, कार्यक्षेत्र में नेतृत्व कर रही हैं, और जीवन के हर क्षेत्र में अपने स्वाभिमान की नई परिभाषा गढ़ रही हैं। ऐसे में यह हमारा परम कर्तव्य बन जाता है कि हम उन्हें एक ऐसा संसार दें, जहाँ उनकी आँखों में भय का नहीं, आत्मविश्वास का तेज हो, जहाँ उनके कदमों में बंधन नहीं, स्वतंत्रता की उड़ान हो।
किसी एक बेटी की सुरक्षा केवल उसके भाई या पिता का दायित्व नहीं है। यह तो पूरे समाज की, हम सबकी सामूहिक चेतना और मानवीयता की परीक्षा है।
इसलिए, हे मेरे आत्मीय जनों, इस रक्षाबंधन पर केवल अपनी बहन से ही नहीं, अपने आप से भी एक प्रश्न पूछिए।
और इस बार, जब हम अपनी बहनों की कलाई से आशीर्वाद लें, तो अपने बेटों को भी पास बिठाएँ। उन्हें प्रेम से समझाएँ कि बेटा, हर स्त्री किसी की बहन, किसी की बेटी या किसी की पत्नी होने से पहले एक सम्पूर्ण मनुष्य है, अपने सम्मान और गरिमा से परिपूर्ण एक स्वतंत्र अस्तित्व है।
उन्हें सिखाएँ कि नारी की रक्षा का अर्थ केवल उसकी ढाल बनना नहीं है। रक्षा का अर्थ है —
उसके मौन को सुनना,
उसके सम्मान में कभी कमी न आने देना,
उसकी स्वतंत्रता को अपनी मर्यादा समझना,
और जहाँ कहीं अन्याय हो, वहाँ मूक दर्शक नहीं, बल्कि उसके पक्ष में खड़ा होने वाला साहस बनना।
यदि हम सच में अपनी बेटियों को सुरक्षित देखना चाहते हैं, तो केवल बेटियों को सीख देना बंद करना होगा। अब समय है कि हम अपने बेटों को गढ़ें — अधिक कोमल, अधिक संवेदनशील, अधिक जिम्मेदार और अधिक सुसंस्कृत बनाएँ।
आइए, इस पावन पर्व पर हम एक ऐसा संकल्प लें —
एक ऐसे समाज का संकल्प, जहाँ किसी बेटी को अपनी सुरक्षा के लिए किसी का मुख नहीं ताकना पड़े, जहाँ कानून, सम्मान, संस्कार और हमारी सामूहिक संवेदना ही उसकी सबसे मजबूत रक्षा-सूत्र बन जाए।
“सशक्त बेटी तब नहीं बनती जब उसे सहारा दिया जाए, सशक्त बेटी तब बनती है जब उसे सम्मान और समान अवसर दिया जाए।”
