जनि जाणूं छै तु, पीठ दिखौंदू, उनि बौढि कि ऐजै, मुखडि देखौंदू।
मेर दूध की लाज रखी ल्यो, अपणं बुबजि जनु फर्ज निभैल्यो,
जा मेरि जिकुडी, जा मेरि मुखडी।
जा मेर लाटा, जा मेर काला।
२- नि मिललि नौकरी, डबखणूं न रै तू,
सोचि सोची कि भटकणूं न रै तू।
कखि भुलि न जै तु, ये चौक ग्वठ्यार,
जोड्यालि त्वेकु हमुन घरबार।
जा मेरि जिकुडी—
३- फूल तोडी कि, बिरणों लयूंचा,
ब्वे बाब, भै बैणौं छोडी अयूंचा,
द्वी छै खुट्टी अभि तक, अब चार ह्वे गैनी,
घर बोणं कि जिमेदारी,
सभि त्वेम ऐ गैनी।
जा मेरि जिकुडी—
४- कुल देवी देवतौं तैं,
भूली न भूली,
दूब सि मौली् तु, जून सि फूली।
बाटु हेरणां राला, तेर भै बैणां,
बुबजि तैं भि तेर, ई आस रैणां।
जनि जाणूं छै तु—-
राही गढ़वाल का ❤️❤️ पण्डित चित्रमणि पोखरियाल जी की बहुत ही भावुक रचना
*जनि जाणूं छै तु, पीठ दिखौंदू, उनि बौढि कि ऐजै, मुखडि देखौंदू।मेर दूध की लाज रखी ल्यो, अपणं बुबजि जनु फर्ज निभैल्यो*, पण्डित चित्रमणि पोखरियाल*
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