*मां भगवती दुर्गा के नौ रूप नवदुर्गा: शिक्षक जे. पी. कुकरेती*

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माँ दुर्गा के नौ रूपों को नवदुर्गा कहा जाता है और प्रत्येक रूप एक विशेष शक्ति और भाव का प्रतिनिधित्व करता है। ये नौ रूप नवरात्र के नौ दिनों में पूजे जाते हैं।
🕉️नवदुर्गा स्तोत्र का मूल मंत्र –
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
🕉️ मूल रूप: नवदुर्गा वास्तव में देवी पार्वती (सती) के ही विभिन्न रूप हैं, जिन्हें उन्होंने धर्म की स्थापना और दुष्टों के नाश के लिए समय-समय पर धारण किया।
🕉️ नवरात्र : वर्ष में चार नवरात्र होते हैं, जिनमें से चैत्र नवरात्र (मार्च-अप्रैल) और शारदीय नवरात्र (सितम्बर- अक्टूबर) सबसे प्रमुख हैं। नौ दिनों तक माॅं के इन नौ रूपों की पूजा की जाती है।
🕉️ग्रहों का नियन्त्रण: ज्योतिष के अनुसार, नवदुर्गा के नौ रूप, नौ ग्रहों को नियंत्रित करते हैं। इनकी पूजा से सम्बन्धित ग्रहों के दोष दूर होते हैं।
🕉️ आध्यात्मिक अर्थ: माॅं के ये नौ रूप केवल देवियाँ नहीं हैं, बल्कि मानव के अंदर मौजूद नौ आध्यात्मिक गुणों का प्रतीक हैं, जिन्हें नवरात्र में जागृत किया जाता है।
🛕माँ शैलपुत्री (पहला दिन)
परिचय: पर्वतराज हिमालय की पुत्री, इन्हें पार्वती या सती भी कहते हैं।
मंत्र / श्लोक:
“वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥”
विशेष तथ्य: ये शक्ति का प्रथम रूप हैं । हाथ में त्रिशूल और कमल है। इनके वाहन नंदी बैल हैं।
🛕माँ ब्रह्मचारिणी (दूसरा दिन)
परिचय: तपस्या करने वाली, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाली।
मंत्र / श्लोक:
“दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥”
विशेष तथ्य: हाथ में जपमाला और कमण्डलु है। यह तप और संयम का प्रतीक है।
🛕माँ चंद्रघंटा (तीसरा दिन)
परिचय: इनके मस्तक पर अर्धचंद्र के आकार की घंटी है।
मंत्र / श्लोक:
“पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥”
विशेष तथ्य: इनके पास दस भुजाएँ और सिंह वाहन है।
इनकी पूजा से भय व शत्रु नाश होता है।
🛕माँ कुष्मांडा (चौथा दिन)
परिचय: इन्हें सृष्टि की आदिकर्त्री माना जाता है।
मंत्र / श्लोक:
“सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥”
विशेष तथ्य: इनकी आठ भुजाएँ होती हैं। ब्रह्मांड की उत्पत्ति के लिए इन्हें आदिशक्ति माना जाता है।
🛕माँ स्कंदमाता (पाँचवाँ दिन)
परिचय: भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता।
मंत्र / श्लोक:
“सिंहासना गतां नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥”
विशेष तथ्य: इनका वाहन सिंह है। गोद में बाल कार्तिकेय को धारण करती हैं।🛕 माँ कात्यायनी (छठा दिन)
परिचय: ऋषि कात्यायन की पुत्री के रूप में जन्मीं।
मंत्र / श्लोक:
“चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥”
विशेष तथ्य: इनकी पूजा से विवाह सम्बन्धित बाधाएँ दूर होती हैं।
ये महिषासुर मर्दिनी के रूप में पूजित हैं।
🛕माँ कालरात्रि (सातवाँ दिन)
परिचय: यह सबसे उग्र रूप है।
मंत्र / श्लोक:
“एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥”
विशेष तथ्य:
इनका रंग कृष्णवर्ण है। ये भय का नाश करती हैं और भक्त को निर्भय बनाती हैं।
🛕माँ महागौरी (आठवाँ दिन)
परिचय: गौर वर्ण वाली, अति शांत रूप।
मंत्र / श्लोक:
“श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुभा।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥”
विशेष तथ्य: इनके हाथ में त्रिशूल और डमरू है। यह रूप सौभाग्य और शांति प्रदान करता है।
🕉️माँ सिद्धिदात्री (नवाँ दिन)
परिचय: सिद्धियाँ प्रदान करने वाली देवी।
मंत्र / श्लोक:
“सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात्सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥”
विशेष तथ्य: इनकी पूजा से आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार की सिद्धियाँ मिलती हैं। कमल पर विराजमान रूप।
🕉️🛕🕉️🛕
✍️”या देवी सर्वभूतेषु दया-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
(जो देवी सब प्राणियों में दया के रूप में विद्यमान हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।)
✍️”या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
(जो देवी सब प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारम्बार नमस्कार है।)
✍️”या देवी सर्वभूतेषु मातृ-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
(जो देवी सब प्राणियों में माता के रूप में विद्यमान हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।)
✍️”या देवी सर्वभूतेषु शांति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
(जो देवी सब प्राणियों में शान्ति के रूप में विद्यमान हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।)
✍️”या देवी सर्वभूतेषु विद्या-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
(जो देवी सब प्राणियों में विद्या के रूप में विद्यमान हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।)

🕉️ श्री विक्रमी सम्वत २०८२, शक सम्वत १९४७, सिद्धार्थ नाम संवत्सर, राजा:सूर्य मन्त्री:सूर्य, याम्यायन, शरद ऋतु, आश्विन माह-शुक्ल पक्ष, श्री शारदीय नवरात्र प्रारम्भ तद् अनुसार 22 सितम्बर 2025।।

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