जसवंतगढ़ की वो रात, महानवीर जसवंत सिंह रावत जी की वीर गाथा वो अनसुनी कथायें, जहाँ आज भी चीन की सेना जाने से डरती है कौन हैं वो सफेद वर्दी में देश के रक्षक जिनसे टकराने की हिम्मत चीनियों के पास नही है: महेन्द्र पाल सिंह रावत

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जसवंतगढ़ की वो रात – जब बाबा ने खुद दुश्मन को ललकारा गांव की याद के साथ बाबा जसवंत के कुछ अविस्मरणीय वीर गाथा के पलो को उल्लेखित करने का मन हुआ क्योंकि हम छा गढ़वाली………… आलेख और संकलन महेन्द्र पाल सिंह रावत। अध्यक्ष पूर्व सैनिक संघर्ष समिति।
एक अनकही घटना, एक नया रोमांच, एक अमर चेतावनी 🇮🇳
साल 1987, नूरानांग। कड़कड़ाती सर्दी। आधी रात।
चीन की तरफ से फिर हलचल थी। नूरानांग पोस्ट पर तैनात नायक हरीश रावत, 5 गढ़वाल की आँखों में नींद नहीं थी। तभी बंकर के बाहर बर्फ पर बूटों की आवाज़ – चर्र…चर्र…चर्र…
हरीश ने राइफल तानी – “कौन है? पासवर्ड बोलो!”
जवाब नहीं आया। सिर्फ एक परछाई। सफेद बर्फ पर सफेद वर्दी। चेहरे पर 21 साल की उम्र ठहरी हुई। कंधे पर गढ़वाल राइफल्स का टाइटल सोल्डर का बैज।
परछाई धीरे से बोली – “मैं जसवंत। पोस्ट नंबर 3 पर हलचल है। अपने लड़कों को बोल दे – आज रात एलएमजी तैयार रखना। वो आएंगे।”
हरीश का गला सूख गया। ये तो… ये तो बाबा जसवंत सिंह थे! डरते-डरते पूछा – “दा, आप?”
बाबा मुस्कुराए – “हाँ रे। मेरी ड्यूटी अभी बाकी है। जब तक एक भी गढ़वाली यहाँ खड़ा है, जसवंत पोस्ट नहीं छोड़ेगा।” हरीश ने वायरलेस उठाया, कमांडिंग ऑफिसर को खबर दी। पूरी यूनिट अलर्ट। ठीक 2:17 AM पर – पोस्ट नंबर 3 पर चीन की तरफ से घुसपैठ। पर इस बार हम तैयार थे। 10 मिनट की फायरिंग। दुश्मन उल्टे पांव भागा। सुबह बर्फ पर खून के निशान मिले।
सुबह का रहस्य
कमांडिंग ऑफिसर साहब जसवंतगढ़ मंदिर पहुंचे। बाबा के बंकर का ताला खुला था। बिस्तर पर सलवटें थीं। और मेज पर… बर्फ में दबा एक कारतूस का खोखा। 7.62 mm एकदम ताजा। बैरल की गंध अभी बाकी थी।रजिस्टर चेक हुआ – रात को पोस्ट नंबर 3 पर कोई नहीं गया था।
पर बाबा गए थे। 25 साल बाद भी बाबा ने अपनी पोस्ट बचाई थी।
बाबा का “ऑर्डर ऑफ द डे” कहते हैं हर अमावस्या की रात जसवंतगढ़ के बंकर से टाइपराइटर की आवाज़ आती है टक .. टक.. टक… सुबह ड्यूटी रजिस्टर पर नए जवानों के नाम लिखे मिलते हैं – “आज गश्त पर राइफलमैन अंकित, राइफलमैन संदीप”।
जो नाम लिखा गया, वो जवान उस हफ्ते सबसे अलर्ट रहता है। बाबा खुद ड्यूटी लगाते हैं।
चीन की चौकी में दहशत
लाइन ऑफ कंट्रोल के उस पार चीनी पोस्ट के सैनिक आज भी मानते हैं – “रात को नूरानांग की तरफ एक अकेला भारतीय सैनिक गश्त करता है। हमने गोली चलाई, पर वो गिरता नहीं।”
उनके कमांडर ने आदेश दे रखा है – “उस सफेद वर्दी वाले से मत उलझना वो 1962 वाला राइफलमैन जसवंत सिंह है” जो 4 गढ़वाल राइफल्स के थे
यही स्थानीय बुजुर्ग मोनपा कहते हैं – जिस रात नूरा को चीन ले गया था, उस रात सेला की आत्मा शांति से नहीं गई। आज भी जब चीन की तरफ से कोई हेलीकॉप्टर नूरानांग के ऊपर मंडराता है, तो अचानक सेला पास पर तूफान आ जाता है। विजिबिलिटी जीरो। हेलीकॉप्टर वापस।


लोग कहते हैं – “सेला दीदी आज भी दा की पोस्ट बचाती है।” इसे जीवंत सेला का इंतकाम कहते है
आज मैने ये कहानी क्यों लिखी? क्योंकि बाबा जसवंत सिंह कोई “इतिहास” नहीं हैं। वो वर्तमान हैं। वो ड्यूटी हैं। जब हम कोटद्वार में रात 12 बजे पार्टी करते हो, तब 14,000 फीट पर -20°C में एक 21 साल का लड़का 62 साल से तुम्हारे लिए जाग रहा है। देश की रक्षा कर रहा है जिसने वर्तमान विज्ञान भी फेल कर दिया है जिस पर हर भारतीय गर्व करता है क्योंकि उनके पास 1962 में युद्ध में दो ऑप्शन थे:—
(क) पोस्ट छोड़कर जान बचाना।
(ख) जान देकर पोस्ट बचाना। उन्होंने दूसरा चुना इसीलिए आज तुम पहला चुन पाते हो। तो सुनो देशवासियो…
अगली बार तिरंगा देखकर सिर्फ “जय हिन्द” मत बोलना।
एक सेकंड रुककर कहना – “थैंक यू जसवंत दा। पोस्ट सम्भालने के लिए।”
क्योंकि नूरानांग की बर्फ में आज भी एक आवाज़ गूंजती है…
“गढ़वाली कभी पोस्ट नहीं छोड़ता… कभी नहीं।” हमें गर्व है बाबा जसवंत सिंह, महावीर चक्र (मरणोपरांत) और गढ़वाल राइफल्स पर जिसने इतने बहादुर सैनिक को भारतीय सेना में चुन कर गढ़वालियों और राष्ट्र का नाम रौशन किया।🫡

जय हिन्द, जय बाबा जसवंत सिंह
जय सेला, जय नूरा – भारत की बेटियाँ 🇮🇳

महेंद्र पाल सिंह रावत
पूर्व सैनिक संघर्ष समिति, कोटद्वार

नोट :
लेख को सुनी हुई घटनाओं के आधार पर लिखा गया है इसमें गलतियां हो सकती है। इस लेख के माध्यम से मेरा उद्वेश्य अपने शहीदों को स्मरण करना और उनकी वीर गाथाओं को जन जन तक पहुंचना है। कही कोई स्मरण, नाम और स्थान गलत अंकित हो तो क्षमा प्रार्थी रहूंगा।

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