*चाय टिपरी की विनती: महेन्द्र जदली*

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चाय टिपरी की विनती
आड़ी तिरछी बल्ली बल्लियो के उपर दुकानदारो से मांग मांग कर लाया गत्ता , गत्ते के उपर काली पन्नी और किनारो पर पुरानी साड़ी मे अपनी गरीबी व लपेटकर बनाई है मैने अपनी यह चाय की टपरी । इस टपरी के नीचे लकड़ी का फर्रा खोबकर उसमे चार टांगे लगाकर बन गया बेंच , फिर एक स्टैण्ड पर एक छोटा गैस चूल्हा बगल मे लकडी जलाने के लिये एक चूल्हा जिसमे लड़की जला कर पुरानी केतली मे पानी गरम रखता हूँ ताकि वह गर्म रहे और मेरी थोडी गैस बच जाय और मेरे परिवार की गाडी खिसक सके । इसके सिवाय एक फराई पान एक करछी पांच सात काँच के गिलास, प्लास्टिक की बाल्टी ( पेंट वाली ) एक प्लास्टिक का डिब्वा इस पूँजी के अलावा रस बन्द, फैन ,मीठे बिस्कुट, और एक लडी गुटका यानि सारी दुकान शाम को फौजी दादा के रिटायरमेंट पर मिले काले बक्से मे पैक ।
सुबह ही आकर देखता रहता हूँ । आने जाने वाली गाडियों को पैदल राहगीरों को । मेरे कान तरसते रहते है यह सुनने को कि चल बै चाय बना ढंग से बनाइयों नही तो —
मन प्रसन्न हो जाता है इन झिड़कियों से फिर मै उन्हें चाय ऐसे परोसता हूँ जैसे कोई भक्त अपने अराध्या को भोग चढाता है । यदि साब ने बिस्कुट या फैन मांग लिया तो मेरी बाँछे खिल जाती है ।
सारी गाडियों से उतरने वाले यात्रियों की मै कभी शक्ल नही देखता बस उनकी आवाज का हुक्म सुनता हूं ।
चाय पिलाना व जूठे बर्तन धोना मेरा काम है । गिलास धोते समय विशेष सावधानी रखता हूँ ताकि आने जाने वाले मुझे देख सके कि मै कितनी सफाई से बर्तन धोता हूं । क्योंकि उनका यह विश्वास मेरी सबसे बड़ी पूँजी है।
इस हाल मे रहकर मै कभी इतना दुःखी नही हुआ । जितना इस आरोप से कि मै अलग अलग गिलास रखता हूँ। सोचो अगर मेरी इतने गिलास रखने की हैसियत होती तो मै सड़क मे होता । मेरे पास जितने लोग चाय पीने आते है उनमे से अधिकांश को मै नही जानता और वे मुझे नही । मै कौन हूँ मेरे से किसी ने कभी नही पूछा फिर मेरी हैसियत कहाँ है कि मै पूँछू कि तुम कौन हो । उनकी खिदमत से तो मेरा परिवार चल रहा है।
मेरी सोच समझ बहुत ज्यादा तो नही है पर इतना जरूर समझने लगा हूँ कि कुछ लोग अपनी विरासत के लिये समाज मे चाय मे जरूर जहर घोल रहे है ।
मै और मेरे जैसे करोड़ो परिवारों की पेट मे लात मारने को टॉग उठा रहे है।
एक जरूरी बात कहना चाहता हूँ कि अगर आपकी खटिया हमारे किसी चाय वाले बिरादर की बजह से खड़ी है तो उसमे हमारा क्या कसूर सबकी किस्मत एक जैसी तो नही ।
आपके पास तो अपनी सियासत
बचाने के कई रास्ते हो सकते है। परन्तु हमारे पास तो इस चाय की टिपरी के सिवाय कुछ नहीं है ।
अतः आपसे सिर झुकाकर विनती है समाज मे इस प्रकार का जहर मत घोलिए । आपका यह जहर सीधे हमारे बच्चों के पेट मे जाएगा । हम कहीं के नही रहेगे
बख्श दीजिए हमे बख्श दीजिए ।
महेन्द्र जदली

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